{"type":"rich","version":"1.0","provider_name":"Transistor","provider_url":"https://transistor.fm","author_name":"Pratidin Ek Kavita","title":"Rekhte Mein Kavita | Uday Prakash","html":"<iframe width=\"100%\" height=\"180\" frameborder=\"no\" scrolling=\"no\" seamless src=\"https://share.transistor.fm/e/cc0e33b1\"></iframe>","width":"100%","height":180,"duration":157,"description":"रेखते में कविता | उदय प्रकाश \n\nजैसे कोई हुनरमन्द आज भी \nघोड़े की नाल बनाता दीख जाता है \nऊँट की खाल की मसक में जैसे कोई भिश्ती \nआज भी पिलाता है जामा मस्जिद और चाँदनी चौक में \nप्यासों को ठण्डा पानी\n\nजैसे अमरकंटक में अब भी बेचता है कोई साधू \nमोतियाबिन्द के लिए गुलबकावली का अर्क\n\nशर्तिया मर्दानगी बेचता है \nहिन्दी अख़बारों और सस्ती पत्रिकाओं में अपनी मूँछ और पग्गड़ के \nफ़ोटो वाले विज्ञापन में हकीम बीरूमल आर्यप्रेमी\n\nजैसे पहाड़गंज रेलवे स्टेशन के सामने सड़क की पटरी पर \nतोते की चोंच में फँसा कर बाँचता है ज्योतिषी \nकिसी बदहवास राहगीर का भविष्य \nऔर तुर्कमान गेट के पास गौतम बुद्ध मार्ग पर \nढाका या नेपाल के किसी गाँव की लड़की \nकरती है मोलभाव रोगों, गर्द, नींद और भूख से भरी \nअपनी देह का\n\nजैसे कोई गड़रिया रेल की पटरियों पर बैठा \nठीक गोधूलि के समय\n\nभेड़ों को उनके हाल पर छोड़ता हुआ \nआज भी बजाता है डूबते सूरज की पृष्ठभूमि में \nधरती का अन्तिम अलगोझा\n\nइत्तेला है मीर इस ज़माने में \nलिक्खे जाता है मेरे जैसा अब भी कोई-कोई \nउसी रेख़्ते में कविता।","thumbnail_url":"https://img.transistorcdn.com/CI1fAMbZA7bkv2hnc9u5BTEVfgUAS1MWnukNGfD53r4/rs:fill:0:0:1/w:400/h:400/q:60/mb:500000/aHR0cHM6Ly9pbWct/dXBsb2FkLXByb2R1/Y3Rpb24udHJhbnNp/c3Rvci5mbS9zaG93/LzQwNDQzLzE2ODA1/MzYzNTQtYXJ0d29y/ay5qcGc.webp","thumbnail_width":300,"thumbnail_height":300}