{"type":"rich","version":"1.0","provider_name":"Transistor","provider_url":"https://transistor.fm","author_name":"Pratidin Ek Kavita","title":"Gaon | Anju Ranjan","html":"<iframe width=\"100%\" height=\"180\" frameborder=\"no\" scrolling=\"no\" seamless src=\"https://share.transistor.fm/e/d24a03cd\"></iframe>","width":"100%","height":180,"duration":216,"description":"गाँव | अंजु रंजन\nजब पिछली बार गाँव छोड़ती थी \nउस पोखर वाले मोड़ से मुड़ती थी \nबरबस ही बाँध लेता था \nमेरे क़दमों को मेरा गाँव! \n\nपिता की तरह वेदना विदुर दृष्टि \nऔर आँसू भरे नयनों को \nपिता की तरह मजबूत दिखावा बनकर \nमौन खड़ा था मेरा गाँव! \n\nमाँ की ममता की तरह \nरूखे हाथों से वे रूखी हवाएँ \nसूखा जाती थी मेरे आँसू\nविपरीत दिशा से बह कर \nवो लिपटा लेती थी ख़ुद से\nमेरी माँ बनकर तब \nनि:शब्द रोता था मेरा गाँव!\n\nदीन-हीन, अनपढ़-अनगढ़ \nमेरा वो मैला-कुचैला गाँव \nमेरे सनील के ख़ुशबू से \nसहम गया सा लगता था \nऔर गोबर और खाद की बदबू को \nधनिया पत्ते से छिपाता था \nतंग गलियों और कच्चे रास्तों के लिए \nजैसे वही जिम्मेदार है! \nऐसा शर्मसार लगता था मेरा गाँव!\n \nमेरी लाल बत्ती वाली गाड़ी के साथ \nसेल्फ़ी लेकर अपनी झेंप मिटाता था \nउसको ख़बर थी कि \nअब मेरा लौट कर आना है मुश्किल \nफिर भी बार-बार लौट आने को \nकहता था मेरा गाँव!\n\nकोई क़ीमत नहीं उन चीज़ों की मेरे लिए \nमैं उन्हें विमान में ले जा भी न सकूँ\nपर तुलसी, नीम और खट्टे बेरों की \nसौग़ातें जुटाता फिरता था मेरा गाँव \nमेरे विदेशी बच्चों को हैरान करता \nभूतहे इमली और शमशान वाली डायन \nके झूठे-सच्चे क़िस्से सुनाता था मेरा गाँव!\n\nकितने अधूरे प्रेम-प्रसंगों और मेरी कितनी \nशरारतों और शैतानियों को \nमुस्कुराकर झेल लेता था गाँव \nमाँ जब तंग आकर मारने दौड़तीं \nतो अपने आग़ोश में छुपा लेता था गाँव!\nमेरे बचपन के इस ख़ज़ाने को लेकर \nमुझे मचलता खोजता फिरता था का गाँव!","thumbnail_url":"https://img.transistorcdn.com/CI1fAMbZA7bkv2hnc9u5BTEVfgUAS1MWnukNGfD53r4/rs:fill:0:0:1/w:400/h:400/q:60/mb:500000/aHR0cHM6Ly9pbWct/dXBsb2FkLXByb2R1/Y3Rpb24udHJhbnNp/c3Rvci5mbS9zaG93/LzQwNDQzLzE2ODA1/MzYzNTQtYXJ0d29y/ay5qcGc.webp","thumbnail_width":300,"thumbnail_height":300}