{"type":"rich","version":"1.0","provider_name":"Transistor","provider_url":"https://transistor.fm","author_name":"Pratidin Ek Kavita","title":"Girna | Naresh Saxena","html":"<iframe width=\"100%\" height=\"180\" frameborder=\"no\" scrolling=\"no\" seamless src=\"https://share.transistor.fm/e/d2775565\"></iframe>","width":"100%","height":180,"duration":387,"description":"गिरना - नरेश सक्सेना\nचीज़ों के गिरने के नियम होते हैं! मनुष्यों के गिरने के \nकोई नियम नहीं होते। \nलेकिन चीज़ें कुछ भी तय नहीं कर सकतीं \nअपने गिरने के बारे में \nमनुष्य कर सकते हैं \nबचपन से ऐसी नसीहतें मिलती रहीं \nकि गिरना हो तो घर में गिरो \nबाहर मत गिरो \nयानी चिट्ठी में गिरो \nलिफ़ाफ़े में बचे रहो, यानी \nआँखों में गिरो \nचश्मे में बचे रहो, यानी \nशब्दों में बचे रहो \nअर्थों में गिरो \nयही सोच कर गिरा भीतर \nकि औसत क़द का मैं \nसाढ़े पाँच फ़ीट से ज़्यादा क्या गिरूँगा \nलेकिन कितनी ऊँचाई थी वह \nकि गिरना मेरा ख़त्म ही नहीं हो रहा \nचीज़ों के गिरने की असलियत का पर्दाफ़ाश हुआ \nसत्रहवीं शताब्दी के मध्य, \nजहाँ, पीसा की टेढ़ी मीनार की आख़िरी सीढ़ी \nचढ़ता है गैलीलियो, और चिल्ला कर कहता है— \n“इटली के लोगो, \nअरस्तू का कथन है कि भारी चीज़ें तेज़ी से गिरती हैं \nऔर हल्की चीज़ें धीरे-धीरे \nलेकिन अभी आप अरस्तू के इस सिद्धांत को ही \nगिरता हुआ देखेंगे \nगिरते हुआ देखेंगे, लोहे के भारी गोलों \nऔर चिड़ियों के हल्के पंखों, और काग़ज़ों को \nएक साथ, एक गति से \nगिरते हुए देखेंगे \nलेकिन सावधान \nहमें इन्हें हवा के हस्तक्षेप से मुक्त करना होगा...” \nऔर फिर ऐसा उसने कर दिखाया \nचार सौ बरस बाद \nकिसी को कुतुबमीनार से चिल्लाकर कहने की ज़रूरत नहीं है \nकि कैसी है आज की हवा और कैसा इसका हस्तक्षेप \nकि चीज़ों के गिरने के नियम \nमनुष्यों के गिरने पर लागू हो गए हैं \nऔर लोग \nहर क़द और हर वज़न के लोग \nयानी \nहम लोग और तुम लोग \nएक साथ \nएक गति से \nएक ही दिशा में गिरते नज़र आ रहे हैं \nइसीलिए कहता हूँ कि ग़ौर से देखो, अपने चारों तरफ़ \nचीज़ों का गिरना \nऔर गिरो \nगिरो जैसे गिरती है बर्फ़ \nऊँची चोटियों पर \nजहाँ से फूटती हैं मीठे पानी की नदियाँ \nगिरो प्यासे हलक़ में एक घूँट जल की तरह \nरीते पात्र में पानी की तरह गिरो \nउसे भरे जाने के संगीत से भरते हुए \nगिरो आँसू की एक बूँद की तरह \nकिसी के दुख में \nगेंद की तरह गिरो \nखेलते बच्चों के बीच \nगिरो पतझर की पहली पत्ती की तरह \nएक कोंपल के लिए जगह ख़ाली करते हुए \nगाते हुए ऋतुओं का गीत \n“कि जहाँ पत्तियाँ नहीं झरतीं \nवहाँ वसंत नहीं आता” \nगिरो पहली ईंट की तरह नींव में \nकिसी का घर बनाते हुए \nगिरो जलप्रपात की तरह \nटरबाइन के पंखे घुमाते हुए \nअँधेरे पर रोशनी की तरह गिरो \nगिरो गीली हवाओं पर धूप की तरह ...","thumbnail_url":"https://img.transistorcdn.com/CI1fAMbZA7bkv2hnc9u5BTEVfgUAS1MWnukNGfD53r4/rs:fill:0:0:1/w:400/h:400/q:60/mb:500000/aHR0cHM6Ly9pbWct/dXBsb2FkLXByb2R1/Y3Rpb24udHJhbnNp/c3Rvci5mbS9zaG93/LzQwNDQzLzE2ODA1/MzYzNTQtYXJ0d29y/ay5qcGc.webp","thumbnail_width":300,"thumbnail_height":300}