{"type":"rich","version":"1.0","provider_name":"Transistor","provider_url":"https://transistor.fm","author_name":"Pratidin Ek Kavita","title":"Us Din | Rupam Mishra","html":"<iframe width=\"100%\" height=\"180\" frameborder=\"no\" scrolling=\"no\" seamless src=\"https://share.transistor.fm/e/d32edf3c\"></iframe>","width":"100%","height":180,"duration":175,"description":"उस दिन | रूपम मिश्र \n\nउस दिन कितने लोगों से मिली \nकितनी बातें , कितनी बहसें कीं\nकितना कहा  ,कितना सुना\nसब ज़रूरी भी लगा था \nपर याद आते रहे थे बस वो पल जितनी देर के लिए तुमसे मिली \nविदा की बेला में हथेली पे धरे गये ओठ देह में लहर की तरह उठते रहे \nकदम बस तुम्हारी तरफ उठना चाहते थे और मैं उन्हें धकेलती उस दिन जाने कहाँ -कहाँ भटकती रही \nवे सारी जगहें मेरी नहीं थीं \nमेरी जगह मुझसे छूट गयी थी\nतो बचे हुए रेह से जीवन में क्या रंग भरती\n\nहवा में जैसे राख ही राख उड़ रही थी जिसकी गर्द से मेरी साँसे भरती जा रही थीं\n\nवहाँ वे भी थे जिनसे मैं अपना दुःख कह सकती थी\nलेकिन संकोच हुआ साथी वहाँ अपना दुख कहते\nजहाँ जीवन का चयन ही दुःख था \nऔर वे हँसते-गाते उन्हें गले लगाते चले जा रहे थे\n\nजहाँ सुख के कितने दरवाज़े अपने ही हाथों से बंद किये गए थे\nजहाँ इस साल जानदारी में कितने उत्सव, ब्याह पड़ेंगे का हिसाब नहीं\nकितने अन्याय हुए\nकितने बेघर हुए\nऔर कितने निर्दोष जेल गये के दंश को आत्मा में सहेजा जा रहा था \n\nफिर भी वियोग की मारी मेरी आत्मा कुछ न कुछ उनसे कह ही लेती \nपर वे मेरे अपने बंजर नहीं थे कि\nमैं दुःख के बीज फेंकती वहाँ और कोई डाभ न उपजती \n\nपर कहाँ उगाते वो मेरे इस गुलाबी दुःख को\nजहाँ की धरती पर शहतूती सपने बोये जाते हैं\nऔर फ़सल काटने का इंतज़ार वहाँ नहीं होता \nबस पीढ़ियों के हवाले दुःखों की सूची करके अपनी राह चलते जाना होता है ।","thumbnail_url":"https://img.transistorcdn.com/CI1fAMbZA7bkv2hnc9u5BTEVfgUAS1MWnukNGfD53r4/rs:fill:0:0:1/w:400/h:400/q:60/mb:500000/aHR0cHM6Ly9pbWct/dXBsb2FkLXByb2R1/Y3Rpb24udHJhbnNp/c3Rvci5mbS9zaG93/LzQwNDQzLzE2ODA1/MzYzNTQtYXJ0d29y/ay5qcGc.webp","thumbnail_width":300,"thumbnail_height":300}