{"type":"rich","version":"1.0","provider_name":"Transistor","provider_url":"https://transistor.fm","author_name":"Pratidin Ek Kavita","title":"Aag Aur Aadmi | Deo Shankar Navin","html":"<iframe width=\"100%\" height=\"180\" frameborder=\"no\" scrolling=\"no\" seamless src=\"https://share.transistor.fm/e/d3db9570\"></iframe>","width":"100%","height":180,"duration":163,"description":"आग और आदमी | देवशंकर नवीन आग और हवा को अपने-पराए की समझ नहीं होतीवह अपने स्वभाव से काम करती हैआग हर कुछ को जला देती हैजीव-जंतु, फूल, कचरा, विष्ठा सब कुछ कोहवा हर कुछ को सोख लेती हैखुशबू, बदबू, मानवता, दानवता सब कुछ कोआग और हवा वातावरण में सदा से थीलोगों को दिखती नहीं थीमनुष्य की किसी वानरी वृत्ति सेआग प्रकट हो गईमनुष्य ने समझा कि आग उसने पैदा कीआग और बदबू को हवा ने हवा दे दीमनुष्य ने समझा कि हवा उसने पैदा कीआग सबसे पहले मनुष्य के दिमाग में सुलगती हैफिर धधकता है उसकी आसुरी वृत्ति का उत्तापजलते हुए लोग बाग बस्ती खेत देख करतृप्त होती हैं उसकी आसुरी वृत्तियाँऊपर से आग के आविष्कर्ता पूर्वजवेदना से कराह उठते हैंचीख कर रोकते हैं अपनी संततियों कोमत कर ऐसा मेरे वंशजआग हमने रक्षा के लिए जलाई थीसंहार के लिए नहीं,वंशज नहीं सुनता है,वंशज को नहीं सुनना हैक्षमता पाकर कोई सृजनसृजता की कहाँ सुनता है!","thumbnail_url":"https://img.transistorcdn.com/CI1fAMbZA7bkv2hnc9u5BTEVfgUAS1MWnukNGfD53r4/rs:fill:0:0:1/w:400/h:400/q:60/mb:500000/aHR0cHM6Ly9pbWct/dXBsb2FkLXByb2R1/Y3Rpb24udHJhbnNp/c3Rvci5mbS9zaG93/LzQwNDQzLzE2ODA1/MzYzNTQtYXJ0d29y/ay5qcGc.webp","thumbnail_width":300,"thumbnail_height":300}