{"type":"rich","version":"1.0","provider_name":"Transistor","provider_url":"https://transistor.fm","author_name":"Pratidin Ek Kavita","title":"Namaskar 2064 | Anamika","html":"<iframe width=\"100%\" height=\"180\" frameborder=\"no\" scrolling=\"no\" seamless src=\"https://share.transistor.fm/e/d5c94baf\"></iframe>","width":"100%","height":180,"duration":193,"description":"नमस्कार, दो हजार चौंसठ - अनामिका\nनमस्कार दो हजार चौंसठ! कैसे हो? इन दिनों कहां हो?\nनमस्कार, पानी!\nनमस्कार, पीपल के पत्तो, \nतुमको बरफ की शकल याद है न? \nदूर वहां उस पहाड़ की चोटी पर उसका घर था, \nकभी-कभी घाटी तक आती थी- मनिहारिन-सी अपनी टोकरी उठाए: दिन-भर कहानियां सुनाती थी परियों की! \nकैसे तुम भूल गए उसको? नमस्कार, नदियो! \nदुबली कितनी हो गई हो!\nआंखों के नीचे पसर आए हैं साये! क्या स्वास्थ्य अच्छा नहीं रहता? स्वास्थ्य केन्द्र चल तो रहा है?\nकैसा है पीपल का पेड़ और ढाबा? कई बरस पहले मुझे ट्रेन में एक लड़का मिला था, \nउसकी उन आंखों में इस पूरी दुनिया की बेहतरी का सपना था! \nक्या तुमने उसको कहीं देखा ? \nउसके ही नाम एक चिट्ठी है, \nएक शुभकामना सन्देश मंगल ग्रह का:\nचाँद की मुहर उस पर है, \nआई है कोरियर से लेकिन पता है अधूरा,\nमोबाइल नम्बर भी है आधा मिटा हुआ ! \nक्या मिट्टी कर लेगी इसको रिसीव उसकी तरफ से ?\nआओ, अंगूठा लगाओ, मिट्टी रानी, नमस्कार!\nअच्छा है- कम-से-कम तुम हो- पीछे-पीछे दूर तक मेरे-\nउड़ती हुई !","thumbnail_url":"https://img.transistorcdn.com/CI1fAMbZA7bkv2hnc9u5BTEVfgUAS1MWnukNGfD53r4/rs:fill:0:0:1/w:400/h:400/q:60/mb:500000/aHR0cHM6Ly9pbWct/dXBsb2FkLXByb2R1/Y3Rpb24udHJhbnNp/c3Rvci5mbS9zaG93/LzQwNDQzLzE2ODA1/MzYzNTQtYXJ0d29y/ay5qcGc.webp","thumbnail_width":300,"thumbnail_height":300}