{"type":"rich","version":"1.0","provider_name":"Transistor","provider_url":"https://transistor.fm","author_name":"Pratidin Ek Kavita","title":"Aparibhashit | Ajay Jugran","html":"<iframe width=\"100%\" height=\"180\" frameborder=\"no\" scrolling=\"no\" seamless src=\"https://share.transistor.fm/e/d6ce8c66\"></iframe>","width":"100%","height":180,"duration":156,"description":"अपरिभाषित | अजेय जुगरान\n\nबारह - तेरह के होते - होते कुछ बच्चे\nखो जाते हैं अपनी परिभाषा खोजते - खोजते\nकिसी का मन अपने तन से नहीं मिलता\nकिसी का तन बचपन के अपने दोस्तों से।\n\nये किशोर कट से जाते हैं आसपास सबसे\nऔर अपनी परिभाषा खोजने की ऊहापोह में\nअपने तन पर लिखने लगते हैं\nसुई काँटों टूटे शीशों से\nएक घनघोर तनाव - अपवाद की भाषा\nजो आस्तीनों - मफ़लरों के नीचे से यदाकदा झलक\nकभी - कहीं उनकी माँओं को आ ही जाती है नज़र।\n\nतब उनसे बंद कमरों में शुरू होती है ऐसी बातचीत\nजिसे बाहर दरवाज़े से कान लगा सुन\nसुन्न हो जाते हैं कई सहमे हुए बाप\nऔर फिर वो रोने - कोसने लगते हैं\nअपने आप, अपनी क़िसमत, और परिभाषाओं  को।\n\nऐसे में अभिभावक अकसर भूल जाते हैं\nप्रकृति में शरीर रूप - रचनाओं की अनेकता\nऔर ठहराने लगते हैं ज़िम्मेदार एक दूसरे को।\nअफसोस इस सारी कटु क़वायद के केंद्र में\n“लोग क्या कहेंगे” से डरा अस्वीकार होता है\nकोई अपरिभाष्य किशोर नहीं।\n\nइस कारण सुलझती नहीं ये पहेली\nबस असुलझी सुलगती रहती है\nधुएँ के एक काले बादल नीचे\nऔर अफसोस फिर मिलतीं हैं\nनस कटी, रेल के पहियों तले और पंखों पर लटकीं\nलाशें कई अपरिभाषित - अर्धनारीश्वरीय संतानों की\nजो सरल स्वीकार से जी सकतीं थीं होकर परिभाषित।","thumbnail_url":"https://img.transistorcdn.com/CI1fAMbZA7bkv2hnc9u5BTEVfgUAS1MWnukNGfD53r4/rs:fill:0:0:1/w:400/h:400/q:60/mb:500000/aHR0cHM6Ly9pbWct/dXBsb2FkLXByb2R1/Y3Rpb24udHJhbnNp/c3Rvci5mbS9zaG93/LzQwNDQzLzE2ODA1/MzYzNTQtYXJ0d29y/ay5qcGc.webp","thumbnail_width":300,"thumbnail_height":300}