{"type":"rich","version":"1.0","provider_name":"Transistor","provider_url":"https://transistor.fm","author_name":"Pratidin Ek Kavita","title":"Dopahar Ki Kahaniyon Ke Mama | Rajesh Joshi","html":"<iframe width=\"100%\" height=\"180\" frameborder=\"no\" scrolling=\"no\" seamless src=\"https://share.transistor.fm/e/d928253e\"></iframe>","width":"100%","height":180,"duration":170,"description":"दोपहर की कहानियों के मामा | राजेश जोशी \nहम उन नटखट बच्चियों के मामा थे\nजो अकसर दोपहर में अपनी नानियों से कहानी सुनने की ज़िद करती थी\nहम हमेशा ही घर लौटने के रास्ते भूल जाते थे\nघर के एकदम पास पहुँचकर मुड़ जाते थे\nकिसी अपरिचित गली में\nअकेले होने से हमें डर लगता था\nऔर लोगों के बीच अचानक ही हम अकेले हो जाते थे\nअर्जियों के साथ हमारा जो जीवन चरित नत्थी था\nउसमें हमारे अनुभवों के लिए कोई जगह नहीं थी\nउसमें चाय की दुकानों और सिगरेट की गुमटियों के\nहमारे उधार खातों का जिक्र नहीं था\nउसमें हमारे रतजगों और आवारगी का कोई किस्सा नहीं था\nकई पेड़ों, खंडहरों और चट्टानों पर लिख आए थे हम अपने नाम\nप्रेमिकाओं को अकसर हम जीवन से जाते हुए देखते थे\nमोची हमारी चप्पलों को देखकर पहले मुस्कुराते थे\nफिर नए थेगले लगाने से इनकार कर देते थे\nहम अपनी खाली जेबों में डाले रहते थे अपने खाली हाथ\nएक खालीपन को दूसरे खालीपन से भरते हुए\nहमें लेकिन एक हुनर में महारत हासिल थी\nहम बहुत सफाई से अपनी हँंसी में अपने आँसू छिपा लेते थे।","thumbnail_url":"https://img.transistorcdn.com/CI1fAMbZA7bkv2hnc9u5BTEVfgUAS1MWnukNGfD53r4/rs:fill:0:0:1/w:400/h:400/q:60/mb:500000/aHR0cHM6Ly9pbWct/dXBsb2FkLXByb2R1/Y3Rpb24udHJhbnNp/c3Rvci5mbS9zaG93/LzQwNDQzLzE2ODA1/MzYzNTQtYXJ0d29y/ay5qcGc.webp","thumbnail_width":300,"thumbnail_height":300}