{"type":"rich","version":"1.0","provider_name":"Transistor","provider_url":"https://transistor.fm","author_name":"Pratidin Ek Kavita","title":"Pita Ka Hatyara | Madan Kashyap","html":"<iframe width=\"100%\" height=\"180\" frameborder=\"no\" scrolling=\"no\" seamless src=\"https://share.transistor.fm/e/dba6d952\"></iframe>","width":"100%","height":180,"duration":341,"description":"पिता का हत्यारा | मदन कश्यप \n\nउसके हाथ में एक फूल होता है\nजो मुझे चाकू की तरह दिखता है\nसच तो यह है कि वह चाकू ही होता है\nजो कैमरों में फूल जैसा दिखता है\nऔर उन तमाम लोगों को भी फूल ही दिखता है\nजो अपनी आँखों से नहीं देखते\nवह मेरे पिता का हत्यारा है\nरोज़ ही मिलता है\nटेलेविज़न चैनलों और अख़बारों में ही नहीं\nकभी-कभार\nसड़कों पर\nआमने-सामने भी\nमैं इतना डर जाता हूँ\nकि डरा हुआ नहीं होने का नाटक भी नहीं कर पाता\nचौदह वर्ष का था जब पिता की हत्या हुई थी\nपिछले तीन वर्षों से बस यही सीख रहा हूँ\nकि जीने के लिए कितना ज़रूरी है मरना\nपिता का शव अस्पताल से घर आया था\nतब मुझे ठीक से पता भी नहीं था कि उनकी हत्या हुई है।\nहमें बताया गया था वे एक पार्टी में गये थे\n\nऔर अचानक उनके ह्रदय की गति रुक गयी\nतीसरे दिन हत्यारे के आ धमकने के बाद ही पता चला\nकि उनकी हत्या हुई थी\nउसके आने से पहले चेतावनियाँ आने लगी थीं\nधमकियाँ पहुँचने लगी थीं\nयह प्रलोभन भी कि मैं जी सकता हूँ\nजैसे पिता भी चाहते तो जी सकते थे\nबिल्कुल मेरे घर वह अकेले ही आया\nसफेद कपड़ों में निहत्था एक तन्दुरुस्त आदमी\nउसने अंगरक्षकों को कुछ पीछे और\nअपने समर्थकों को कुछ और अधिक पीछे रोक दिया था\nमेरे माथे पर हाथ फेरा\nलगा जैसे चमड़े सहित मेरे बाल नुच जायेंगे\nसिसकते हुए मैं अपने गालों पर लुढ़क रहे\nआँसुओं को छूकर आश्वस्त हुआ\nवह ख़ून की धार नहीं थी\nवह बिना किसी आग्रह के बैठ गया\nऔर हमारे ही घर में हमें बैठने का इशारा किया\nफिर धीरे-धीरे बोलने लगा\nमानो मुझसे या मेरी माँ से नहीं\nकिसी अदृश्य से बातें कर रहा हो\nकरनी पड़ती है\nहत्या भी करनी पड़ती है।\nतुम बच्चे हो और तुम्हारी माँ एक विधवा\nधीरे-धीरे सब समझ जाओगे\n\nमैं समझता हूँ तुम अभी जीना चाहते हो\nऔर मैं भी इस मामले को यहीं ख़त्म कर देना चाहता हूँ\nयह इकलौती नहीं है\nऔर भी हत्याएँ हैं और भी हत्याएँ होनी हैं\nतुम्हें साफ-साफ बता दूँ\nकि हत्या मेरी मजबूरी या ज़रूरत भर नहीं है।\nवे और हैं जो राजनीति के लिए हत्याएँ करते हैं\nमैं हत्या के लिए राजनीति करता हूँ\nहत्या को संस्कृति का अनिवार्य हिस्सा बनाकर\nतमाम विवादों - बहसों को ख़त्म कर दूँगा एक साथ\nऔर जाते-जाते तुम्हें साफ-साफ बता दूँ\nतुम्हारे पिता की हत्या ही हुई थी\nक्योंकि वह मुझे हत्यारा सिद्ध करने की ज़िद नहीं छोड़ रहे थे\nअब तुम ऐसी कोई ज़िद मत पालना\nवह चला गया तब...","thumbnail_url":"https://img.transistorcdn.com/CI1fAMbZA7bkv2hnc9u5BTEVfgUAS1MWnukNGfD53r4/rs:fill:0:0:1/w:400/h:400/q:60/mb:500000/aHR0cHM6Ly9pbWct/dXBsb2FkLXByb2R1/Y3Rpb24udHJhbnNp/c3Rvci5mbS9zaG93/LzQwNDQzLzE2ODA1/MzYzNTQtYXJ0d29y/ay5qcGc.webp","thumbnail_width":300,"thumbnail_height":300}