{"type":"rich","version":"1.0","provider_name":"Transistor","provider_url":"https://transistor.fm","author_name":"Pratidin Ek Kavita","title":"Dhahai | Prashant Purohit","html":"<iframe width=\"100%\" height=\"180\" frameborder=\"no\" scrolling=\"no\" seamless src=\"https://share.transistor.fm/e/dd2ac881\"></iframe>","width":"100%","height":180,"duration":194,"description":"ढहाई | प्रशांत पुरोहित \n\nउसने पहले मेरे घर के \nदरवाज़े को तोड़ा,\nछज्जे को पटका फिर,\nबालकनी को टहोका,\nअब दीवारों का नम्बर आया,\nतो उन्हें भी गिराया,\nमेरे छोटे मगर उत्तुंग घर की \nज़मीन चौरस की,\nमेरी बच्ची किसी \nबची-खुची मेहराब के नीचे\nसो न जाए कहीं,  \nहरिक छोटे छज्जे को अपने\nलोहे के हाथ से सहलाया,\nमेरे आँगन को पथराया\nउसका लोहा ग़ुस्से से गर्म था,\nलाल था,\nउसे लगा मेरे विरोध की आवाज़ में \nकोई भारी बवाल था \nवो जब उठी थी तो अकेली नहीं थी,\nअब घर बैठ गया है तो भी खड़ी है -\nमेरी आवाज़। \nसाहूकार की योजना है -\nऐसी सब आवाज़ों को \nघर ढहा अकेला करने की\nमगर अब सब बेघर आवाज़ें \nसमवेत उठती हैं,\nघर गिरा मगर \nस्वर न गिरे \nये आवाज़ें अल्ट्रासोनिक हैं,\nजो सुनाई नहीं पड़तीं मगर \nदिखती हैं,\nदिखाती हैं -\nकभी आपके गुर्दे में पड़ी \nपथरी को तोड़कर,\nकभी आपके अंदर बनी, पली\nबच्ची को आँवल से जोड़कर\nये अपने घर के मलबे पर \nउकड़ूँ बैठीं \nलोहा-ढलीं आवाज़ें \nतोड़ेंगी - \nउन सब पथरियों को \nजिन्हें व्यवस्था ने चिना,\nजिनसे ये खिड़की के बिना,\nसिर्फ़ अंदर खुलते दरवाज़ों वाले \nभवन बने हैं,\nये कमज़ोर शरीरों की \nभिंची-उठी मुट्ठियों के नीचे \nपपड़ाए होठों,\nसूखे गलों से निकलतीं\nअलग-अलग स्वरों में  \nएक ही बात कहतीं, \nएक ही आवृत्ति की तरंगें निकालतीं,\nएक ही दिशा में बहतीं \nआवाज़ें - \nतोड़ डालेंगी चारों सुनहरे पाये\nउस मख़मली सिंहासन के,\nजो अपने आप को \nप्रजातंत्र कहता है।","thumbnail_url":"https://img.transistorcdn.com/CI1fAMbZA7bkv2hnc9u5BTEVfgUAS1MWnukNGfD53r4/rs:fill:0:0:1/w:400/h:400/q:60/mb:500000/aHR0cHM6Ly9pbWct/dXBsb2FkLXByb2R1/Y3Rpb24udHJhbnNp/c3Rvci5mbS9zaG93/LzQwNDQzLzE2ODA1/MzYzNTQtYXJ0d29y/ay5qcGc.webp","thumbnail_width":300,"thumbnail_height":300}