{"type":"rich","version":"1.0","provider_name":"Transistor","provider_url":"https://transistor.fm","author_name":"Pratidin Ek Kavita","title":"Satpura Ke Jungle | Bhawani Prasad Mishra","html":"<iframe width=\"100%\" height=\"180\" frameborder=\"no\" scrolling=\"no\" seamless src=\"https://share.transistor.fm/e/e03aed3b\"></iframe>","width":"100%","height":180,"duration":330,"description":"सतपुड़ा के जंगल - भवानीप्रसाद मिश्र\n\nसतपुड़ा के घने जंगल \nनींद में डूबे हुए-से, \nऊँघते अनमने जंगल। \nझाड़ ऊँचे और नीचे \nचुप खड़े हैं आँख भींचे; \nघास चुप है, काश चुप है \nमूक शाल, पलाश चुप है; \nबन सके तो धँसो इनमें, \nधँस न पाती हवा जिनमें, \nसतपुड़ा के घने जंगल \nनींद में डूबे हुए-से \nऊँघते अनमने जंगल। \nसड़े पत्ते, गले पत्ते, \nहरे पत्ते, जले पत्ते, \nवन्य पथ को ढँक रहे-से \nपंक दल में पले पत्ते, \nचलो इन पर चल सको तो, \nदलो इनको दल सको तो, \nये घिनौने-घने जंगल, \nनींद में डूबे हुए-से \nऊँघते अनमने जंगल। \nअटपटी उलझी लताएँ, \nडालियों को खींच खाएँ, \nपैरों को पकड़ें अचानक, \nप्राण को कस लें कपाएँ, \nसाँप-सी काली लताएँ \nबला की पाली लताएँ, \nलताओं के बने जंगल, \nनींद में डूबे हुए-से \nऊँघते अनमने जंगल। \nमकड़ियों के जाल मुँह पर, \nऔर सिर के बाल मुँह पर, \nमच्छरों के दंश वाले, \nदाग़ काले-लाल मुँह पर, \nबात झंझा वहन करते, \nचलो इतना सहन करते, \nकष्ट से ये सने जंगल, \nनींद मे डूबे हुए-से \nऊँघते अनमने जंगल। \nअजगरों से भरे जंगल \nअगम, गति से परे जंगल, \nसात-सात पहाड़ वाले, \nबड़े-छोटे झाड़ वाले, \nशेर वाले बाघ वाले, \nगरज और दहाड़ वाले, \nकंप से कनकने जंगल, \nनींद मे डूबे हुए-से \nऊँघते अनमने जंगल। \nइन वनों के ख़ूब भीतर, \nचार मुर्ग़े, चार तीतर, \nपाल कर निश्चिंत बैठे, \nविजन वन के बीच बैठे, \nझोंपड़ी पर फूस डाले \nगोंड तगड़े और काले \nजब कि होली पास आती, \nसरसराती घास गाती, \nऔर महुए से लपकती, \nमत्त करती बास आती, \nगूँज उठते ढोल इनके, \nगीत इनके गोल इनके। \nसतपुड़ा के घने जंगल \nनींद मे डूबे हुए-से \nऊँघते अनमने जंगल। \nजगते अँगड़ाइयों में, \nखोह खड्डों खाइयों में \nघास पागल, काश पागल, \nशाल और पलाश पागल, \nलता पागल, वात पागल, \nडाल पागल, पात पागल, \nमत्त मुर्ग़े और तीतर, \nइन वनों के ख़ूब भीतर। \nक्षितिज तक फैला हुआ-सा, \nमृत्यु तक मैला हुआ-सा \nक्षुब्ध काली लहर वाला, \nमथित, उत्थित ज़हर वाला, \nमेरु वाला, शेष वाला, \nशंभु और सुरेश वाला, \nएक सागर जानते हो? \nठीक वैसे घने जंगल, \nनींद मे डूबे हुए-से \nऊँघते अनमने जंगल। \nधँसो इनमें डर नहीं है, \nमौत का यह घर नहीं है, \nउतर कर बहते अनेकों, \nकल-कथा कहते अनेकों, \nनदी, निर्झर और नाले, \nइन वनों ने गोद पाले, \nलाख पंछी, सौ हिरन-दल, \nचाँद के कितने किरन दल, \nझूमते बनफूल, फलियाँ, \nखिल रहीं अज्ञात...","thumbnail_url":"https://img.transistorcdn.com/CI1fAMbZA7bkv2hnc9u5BTEVfgUAS1MWnukNGfD53r4/rs:fill:0:0:1/w:400/h:400/q:60/mb:500000/aHR0cHM6Ly9pbWct/dXBsb2FkLXByb2R1/Y3Rpb24udHJhbnNp/c3Rvci5mbS9zaG93/LzQwNDQzLzE2ODA1/MzYzNTQtYXJ0d29y/ay5qcGc.webp","thumbnail_width":300,"thumbnail_height":300}