{"type":"rich","version":"1.0","provider_name":"Transistor","provider_url":"https://transistor.fm","author_name":"Pratidin Ek Kavita","title":"Baad | Damodar Khadse","html":"<iframe width=\"100%\" height=\"180\" frameborder=\"no\" scrolling=\"no\" seamless src=\"https://share.transistor.fm/e/e5a3ef9e\"></iframe>","width":"100%","height":180,"duration":260,"description":"बाढ़ - दामोदर खड़से\nबाढ़ जब तोड़ती है दरवाज़े\nबड़े-बड़े बांधों के \nतब नन्हें-नन्हें गाँव\nकाले बादलों की नीयत समझ जाते हैं\nपानी का रंग दिमाग बदरंग कर जाता है\nपानी जीवन भी है बिजली भी पानी\nनहर और झील भी है पानी\nनाचता हुआ समंदर और मदमस्त बादल है पानी\nपानी, पानी यानी सबकुछ है\nपर जब बाढ़ आती है,\nपानी के विवेक पर प्रश्नचिन्ह लगा जाती है\nबाढ़ नदी-नालों का पानी समेट\nबहुमत पा जाती है\nऔर अपने आप को बहाव के हाथों\nसौंप जाती है\nगति जब छूट जाती है पानी के हाथों से\nपानी विक्राल हो जाता है\nतब प्यास भी पानी से घबराती है\nकिनारे जल-समाधि को मजबूर हो जाते हैं\nफसलें उखड़ने लगती हैं\nवर्तमान काला और भविष्य अंधा हो जाता है\nभूतकाल से तब उठती हैं सवालों की प्रतिध्वनियाँ\nतब रिश्तों को रतौंधी हो जाती है\nऔर चांदनी रातों में भी बाढ़\nअपनी राह निकालने के लिए\nसरपट काले आँसू दौड़ाती है\nऐसे में भरे-पूरे वृक्ष भी\nहरहराकर टूट पड़ते हैं\nविवश डूबती आँखें\nविप्लव के दृश्य देखती हैं\nसुनों, रिश्तों में भी कभी-कभी\nऐसा ही होता है\nपता नहीं क्या है जो आदमी को\nबाढ़ की तरह दौड़ाता है\nऔर उसी की आँखों से उसे\nविप्लव दिखाता है \nपर घबराओं नहीं, इधर देखो\nनन्हें-नन्हें दूब के पौधे\nअपनी ज़मीन से किस तरह जुड़े हैं\nवर्तमान की आँखों में\nउभरते नहीं होंगे वे\nपर उनकी रेशमी जड़ें अपनी धरती से\nजुड़ी हैं\nविप्लव के बाद भी\nनई ऊर्जा से उठते हैं वे\nसृष्टि ऐसे ही पैधों में पाती है\nसार्थकता\nआओ, ऐसी अंधी बाढ़ में\nहम इन कत्थई कोपलों की रक्षा करें \nधरती हरी-भरी ही अच्छी लगती है।","thumbnail_url":"https://img.transistorcdn.com/CI1fAMbZA7bkv2hnc9u5BTEVfgUAS1MWnukNGfD53r4/rs:fill:0:0:1/w:400/h:400/q:60/mb:500000/aHR0cHM6Ly9pbWct/dXBsb2FkLXByb2R1/Y3Rpb24udHJhbnNp/c3Rvci5mbS9zaG93/LzQwNDQzLzE2ODA1/MzYzNTQtYXJ0d29y/ay5qcGc.webp","thumbnail_width":300,"thumbnail_height":300}