{"type":"rich","version":"1.0","provider_name":"Transistor","provider_url":"https://transistor.fm","author_name":"Pratidin Ek Kavita","title":"Uski Grahasthi | Rajesh Joshi ","html":"<iframe width=\"100%\" height=\"180\" frameborder=\"no\" scrolling=\"no\" seamless src=\"https://share.transistor.fm/e/ea6f13f9\"></iframe>","width":"100%","height":180,"duration":179,"description":"उसकी गृहस्थी | राजेश जोशी \n\nथकी हारी लौटी है वो आफिस से अभी\nटिफिन बाक्स को रसोई में रखती है।\nमुँह पर पानी के छीटे मारती है\nबाहर निकल आई लट को वापस खोंसती है।\nबालों में\nआँखों को हौले से दबाती है हथेलियों से\nउठती है और रसोईघर की ओर जाने को होती है।\nमैं कहता हूँ, 'बैठो, तुम, आज मैं चाय बनाता हूँ !\nमेरी आवाज़ की नोक मुझ़ी को चुभती है।\nगैस जला कर चाय का पानी चढ़ाता हूँ\nऔर दूसरे ही पल आवाज़ लगाता हूँ\nसुनो शक्कर किस डब्बे में रखी है\nऔर चाय की पत्ती कहाँ है ?\nसाड़ी का पल्लू कमर में खोंसती हुई वो आती है।\nमुझे हटाते हुए कहती है- हटो, तुम्हें नहीं मिलेगी कोई चीज़।\nहोठों को तिरछा करती अजीब ढंग से मुस्कुराती है।\nमुश्किल है उस मुस्कुराहट का ठीक-ठीक अर्थ\nसमझा पाना\nजैसे कहती हो यह मेरी सृष्टि है\nतुम नहीं जान पाओगे कभी\nकि किन बादलों में रखी हैं बारिशें और किनमें रखा है कपास\nकोई डब्बा खोलते हुए कहती है :\nयह तो मैं हूँ कि अबेर रखा है सब कुछ \nवरना तुम तो ढूंढ नहीं पाते अपने आप को\nजाओं बाहर जाकर टी वी देखो\nएक काम पूरा नहीं करोगे और फैला दोगे\nमेरी पूरी रसोई ।","thumbnail_url":"https://img.transistorcdn.com/CI1fAMbZA7bkv2hnc9u5BTEVfgUAS1MWnukNGfD53r4/rs:fill:0:0:1/w:400/h:400/q:60/mb:500000/aHR0cHM6Ly9pbWct/dXBsb2FkLXByb2R1/Y3Rpb24udHJhbnNp/c3Rvci5mbS9zaG93/LzQwNDQzLzE2ODA1/MzYzNTQtYXJ0d29y/ay5qcGc.webp","thumbnail_width":300,"thumbnail_height":300}