{"type":"rich","version":"1.0","provider_name":"Transistor","provider_url":"https://transistor.fm","author_name":"Pratidin Ek Kavita","title":"Rotiyan | Ekta Verma","html":"<iframe width=\"100%\" height=\"180\" frameborder=\"no\" scrolling=\"no\" seamless src=\"https://share.transistor.fm/e/ec5a690c\"></iframe>","width":"100%","height":180,"duration":176,"description":"रोटियाँ ।  एकता वर्मा \n\nरोटियों की स्मृतियों में आँच की कहानियाँ गमकती हैं।\n\nअम्मा बताती हैं,\nसेसौरी के ईंधन पर चिपचिपाई सी फूलती हैं रोटियाँ \nसौंफ़ला पर सिंकी रोटियाँ धुँवाई; पकती हैं चटक-चटक \nनीम के ईंधन पर कसैली सी, करुवाती हैं रोटियाँ\nपर, अरहर की जलावन पर पकती हैं भीतर-बाहर बराबर।\n\nअम्मा का मानना है, शहर रोटियों के स्वाद नहीं जानते\nस्टोव की रोटियों में महकती है किरोसिन की भाप \nऔर ग़ैस पर तो पकती हैं, कचाती, बेस्वाद, बेकाम रोटियाँ।\n\nरोटियों की इन सोंधाती क़िस्सागोई के बीचों-बीच\nमेरे सीने पर धक्क से गिरता है एक सवाल \nसवाल कि -\nगाज़ा की रोटी कैसी महकती होगी?\n\nगाज़ा की रोटी कैसी महकती होगी,\nजिसे सेंक रही हैं बुर्कानशीं औरतें ध्वस्त इमारत के बीचों-बीच \nउन्हीं इमारतों का फ़र्नीचर जलाकर।\n\nक्या गाज़ा की रोटियों में महकता होगा खून \nअजवाइन की तरह बीच-बीच में \nकि राशन के कैंप में, \nरक्तरंजित लाशों बीच से खींचकर लायी जाती हैं आँटे की बोरियाँ \n\nक्या किसी कौर में किसक जाती होगी कोई चिरपरिचित ‘आह’ \nकि चूल्हे के ठीक नीचे, मलबे की तलहटी में \nदफ़्न हो गए उस परिवार के सात लोग एक ही साथ \n\nइन रोटियों को निगलते हुए गले में अटकता होगा \nउन किताबों का अलिफ़,\nगृहस्थी की सबसे व्यर्थ सामग्री की तरह\nजिन्हें सुहूर की दाल बनाने में चूल्हे में झोंक दिया गया \n\nक्या गाज़ा की रोटियाँ \nकचाती सी, \nतालु में चिपकती होंगी \nकि पूरा देश जल जाने बावजूद \nदुनिया देखती है फ़िलिस्तीन की तरफ़, अब भी बहुत ठंडी, सूखी आँखों से।","thumbnail_url":"https://img.transistorcdn.com/CI1fAMbZA7bkv2hnc9u5BTEVfgUAS1MWnukNGfD53r4/rs:fill:0:0:1/w:400/h:400/q:60/mb:500000/aHR0cHM6Ly9pbWct/dXBsb2FkLXByb2R1/Y3Rpb24udHJhbnNp/c3Rvci5mbS9zaG93/LzQwNDQzLzE2ODA1/MzYzNTQtYXJ0d29y/ay5qcGc.webp","thumbnail_width":300,"thumbnail_height":300}