{"type":"rich","version":"1.0","provider_name":"Transistor","provider_url":"https://transistor.fm","author_name":"Pratidin Ek Kavita","title":"Restaurant Mein Intezar | Rajesh Joshi","html":"<iframe width=\"100%\" height=\"180\" frameborder=\"no\" scrolling=\"no\" seamless src=\"https://share.transistor.fm/e/eee3014e\"></iframe>","width":"100%","height":180,"duration":141,"description":"रेस्त्राँ में इंतज़ार | राजेश जोशी \n\nवो जिससे मिलने आई है अभी तक नहीं आया है \nवो बार बार अपना पर्स खोलती है और बंद करती है \nघड़ी देखती है और देखती है \nकि घड़ी चल रही है या नहीं \nएक अदृश्य दीवार उठ रही है उसके आसपास \nऊब और बेचैनी के इस अदृश्य घेरे में वह अकेली है \nएकदम अकेली \nवेटर इस दीवार के बाहर खड़ा है\n\nवेटर उसके सामने पहले ही एक गिलास पानी रख चुका है \nधीरे धीरे दो घूँट पानी पीती है \nऔर ठंडे गिलास को अपनी दुखती हुई आँखों पर लगाती है \nवो रेस्त्राँ के बाहर लगे पेड़ों के पार \nदेखने की कोशिश करती है \nपेड़ जैसे पारदर्शी हों ! \nअदृश्य दीवार के बाहर खड़ा वेटर असमंजस में है \nआर्डर लेने जाए या नहीं\n\nजीवन की न जाने कितनी आपाधापी के बीच से \nचुरा कर लाई थी वो इस समय को \nजो धीरे धीरे बीत रहा है\n\nउसने अपनी कुर्सी को घुमा लिया है \nप्रवेश द्वार की ओर पीठ करके बैठ गई है\nजैसे उम्मीद की ओर\n\nवो सुनती है कहीं अपने अंदर बहुत धीमी \nकिसी चीज़ के दरकने की आवाज़ !","thumbnail_url":"https://img.transistorcdn.com/CI1fAMbZA7bkv2hnc9u5BTEVfgUAS1MWnukNGfD53r4/rs:fill:0:0:1/w:400/h:400/q:60/mb:500000/aHR0cHM6Ly9pbWct/dXBsb2FkLXByb2R1/Y3Rpb24udHJhbnNp/c3Rvci5mbS9zaG93/LzQwNDQzLzE2ODA1/MzYzNTQtYXJ0d29y/ay5qcGc.webp","thumbnail_width":300,"thumbnail_height":300}