{"type":"rich","version":"1.0","provider_name":"Transistor","provider_url":"https://transistor.fm","author_name":"Pratidin Ek Kavita","title":"Nadiyaan | Kedarnath Singh","html":"<iframe width=\"100%\" height=\"180\" frameborder=\"no\" scrolling=\"no\" seamless src=\"https://share.transistor.fm/e/ef5acdfb\"></iframe>","width":"100%","height":180,"duration":233,"description":"नदियाँ - केदारनाथ सिंह\nवे हमें जानती हैं\nजैसे जानती हैं वे अपनी मछलियों की बेचैनी\nअपने तटों का तापमान\nजो कि हमीं हैं\nबस हमीं भूल गए हैं\nहमारे घर कभी उनका भी\nआना-जाना था\nउनकी नसों में बहता है\nपहाड़ों का खून\nजिसमे थोड़ा सा खून\nहमारा भी शामिल है\nऔर गरम-गरम दूध\nटपकता हुआ भूरे दरख्तों की छाल से\nपता लगा लो\nदरख्तों की छाल\nऔर हमारी त्वचा का गोत्र\nएक ही है\nपरछाइयां भी असल में\nनदियाँ ही हैं\nहमीं से फूटकर\nहमारी बगल में चुपचाप बहती हुई नदियाँ\nहर आदमी अपनी परछाई में\nनहाता है\nऔर लगता है\nनदी में नहा रहा है\nजो लगता है वह भी\nउतना ही सच है\nजितना कोई भी नदी\nपुल -\nपृथ्वी  के सारे के सारे पुल\nएक गहरा षड्यंत्र हैं नदियों के खिलाफ\nऔर नदियाँ उन्हें इस तरह बर्दाश्त करती हैं\nजैसे क़ैदी ज़ंजीरों को\nहालांकि नदियाँ इसीलिए नदियाँ है\nकि वे जब भी चाहती हैं\nउलट-पुलट आर देती हैं सारा कैलेण्डर\nऔर दिशाओं के नाम\nहमारे देश में नदियाँ\nजब कुछ नहीं करतीं\nतब वे शवों का इंतजार करती हैं\nअँधेरे को चीरते हुए\nआते हैं शव\nवे आते हैं अपनी चुप्पियों की चोट से\nजीने की धार को तीव्रतर करते हुए\nनदियाँ उन्हें देखती हैं\nऔर जैसे चली जाती हैं कहीं अपने ही अन्दर\nकिन्हीं जलमग्न शहरों की\nगंध की तलाश में\nनदियाँ जो कि असल में\nशहरों का आरम्भ हैं\nऔर शहर जो कि असल में\nनदियों का अंत\nमुझे याद नहीं\nमैंने भूगोल की किस किताब में पढ़ा था\nअंत और आरम्भ\nअपने विरोध की सारी ऊष्मा के साथ\nजिस जगह मिलते हैं\nकहीं वहीं से निकलती हैं\nसारी की सारी नदियाँ.","thumbnail_url":"https://img.transistorcdn.com/CI1fAMbZA7bkv2hnc9u5BTEVfgUAS1MWnukNGfD53r4/rs:fill:0:0:1/w:400/h:400/q:60/mb:500000/aHR0cHM6Ly9pbWct/dXBsb2FkLXByb2R1/Y3Rpb24udHJhbnNp/c3Rvci5mbS9zaG93/LzQwNDQzLzE2ODA1/MzYzNTQtYXJ0d29y/ay5qcGc.webp","thumbnail_width":300,"thumbnail_height":300}