{"type":"rich","version":"1.0","provider_name":"Transistor","provider_url":"https://transistor.fm","author_name":"Pratidin Ek Kavita","title":"Dehri | Geetu Garg","html":"<iframe width=\"100%\" height=\"180\" frameborder=\"no\" scrolling=\"no\" seamless src=\"https://share.transistor.fm/e/ef5b4d0c\"></iframe>","width":"100%","height":180,"duration":149,"description":"देहरी | गीतू गर्ग \n\nबुढ़ा जाती है \nमायके की\n ढ्योडियॉं\nअशक्त होती \nमॉं के साथ..\nअकेलेपन को\nसीने की कसमसाहट में \nभरने की आतुरता \nनिढाल आशंकाओं में \nझूलती उतराती..\n\nथाली में परसी \nएक तरकारी और दाल\nदेती है गवाही \nदीवारों पर चस्पाँ \nकैफ़ियत की\nअब इनकी उम्र को\nलच्छेदार भोजन नहीं पचता \nमन को चलाना \nइस उमर में नहीं सजता \n\nहोंठ भीतर ही भीतर \nफड़फड़ाते हैं \nबिटिया को खीर पसंद है\nऔर सबसे बाद में \nकरारा सा पराठाँ\nवो प्यारी मनुहार बाबुल की\nखो गई कब की\nसमय ने किस किस को \nकहॉं कहॉं बाँटा..\n\nमॉं !\nतू इतना भी चुप मत रह\nन होने दें ये सन्नाटे \nखुद पर हावी\nउमर ही बढ़ी है\nपर जीना है \nअभी भी बाक़ी \nइस घर की बगिया को\nतूने ही सँवारा है\nहर चप्पे पर सॉंस लेता\nस्पर्श तुम्हारा है \n\nबरसों पहले छोड़ी \nदेहरी अब भी पहचानती है\nबूढ़ी हो गई तो क्या \nपदचापों को \nखूब जानती है \nमाना कि ओहदों की \nपारियाँ बदल गई है \nरिश्तों की प्रमुखता \nहाशियों पर फिसल गई है \nपर जाने से पहले यों \nजीना ना छोड़ना \nअधिकार की डोरी \nन हाथों से छोड़ना..","thumbnail_url":"https://img.transistorcdn.com/CI1fAMbZA7bkv2hnc9u5BTEVfgUAS1MWnukNGfD53r4/rs:fill:0:0:1/w:400/h:400/q:60/mb:500000/aHR0cHM6Ly9pbWct/dXBsb2FkLXByb2R1/Y3Rpb24udHJhbnNp/c3Rvci5mbS9zaG93/LzQwNDQzLzE2ODA1/MzYzNTQtYXJ0d29y/ay5qcGc.webp","thumbnail_width":300,"thumbnail_height":300}