{"type":"rich","version":"1.0","provider_name":"Transistor","provider_url":"https://transistor.fm","author_name":"Pratidin Ek Kavita","title":"Kavita Ki Hawa | Kanishka","html":"<iframe width=\"100%\" height=\"180\" frameborder=\"no\" scrolling=\"no\" seamless src=\"https://share.transistor.fm/e/f0cf28d7\"></iframe>","width":"100%","height":180,"duration":327,"description":"कविता की हवा | कनिष्काजब भीपापड़ तिलौरीचुराछनतेढक के न रखेंतो हवा लगने से खराब हो जातेहवा न लगे इसलिएमेहमानों को परोसे गए बचेबिस्कुटमठरीनमकीननमकपारोंजैसी चीजों को डब्बे मेंबंद करके रखा जाता हैताकि हवा न लगेहवा लगना कभी भीअच्छा नहीं माना गयाहवाएँ एक भुलक्कड़ जलचर हैजो संसार रुपी समुद्र में यहाँ वहाँ किसी से भी जाटकरा उसे अपने गिरोह में मिला लेते हैंपत्थरों को जब हवा लगी तोवह तैरना भूल गएपानी को हवा लगी तो ठहरना भूल गईवैसे ही परिवर्तनीय प्रकृति को हवा लगीतो वह स्थिरता भूल गईनाना को हवा लगी तो वो साँस लेना भूल गएसुगना जब पढ़ने विदेश गईतो घर भूल गईदादी ने कहाउसे हवा लग गई हैजब बबलू को हवा लगीतो वो माँ बाप भूल गयाहवा लगने के क्रम मेंबस जब घर को हवा लगी तोवो कुछ भी नहीं भूलेबस चुपचाप दो हिस्सों मेंएक लकीर के सहारे खड़े रहेमाँ कविता लिखती हैबेहिसाब लिखती हैवो घंटो नल के आगे बैठतीजैसे नल कोई फनकार हैऔर नल से कविता के शब्दबह रहे हैमाँ जब भी किसी काम में देर करतीघरवाले सोचतेकविता गढ़ रही होगीवो सुनाने जाती तोघरवाले कहतेइन सब के लिए उनके पास टाइम नहींशायद इसीलिए क्योंकि माँ नेकविता में एकान्त ढूंढ लिया हैवो इस तरह एकान्त पर पसरेगीके यादों के चमकीले टुकड़े सीने से पिघल जाएंगेफिर गाहे गाहे माँ के पूरे शरीर को कलेजा चूस लेगाउनका कलेजा बढ़ते बढ़तेघरशहरब्रह्मांडऔर इश्वर तक कोनिगल लेगाफिर वोखुदको जान जाएगीऔर ये घरवालों के लिए ख़तरनाक हैअगर ऐसा हुआतो समाज स्त्रियों को ब्लैक होल साबित कर देगाइसलिएबच जाता हैमाँ के लिएआधे चाँद पर रगड़ा नूनऔर एक रोटी के बराबर का पेटउनसे कितना कहाबिन मसाले का पकाओबढती उम्र में ये सब हम नहीं खा सकतेतब भी बूढ़ी माँ अपनी कविताओं को कभीपक रहे सादे भात में मिला देती हैकभी फीकी दाल मेंतो बेस्वाद सी हो सकने वाली खिचड़ी मेंइस तरह कई बारबस कविताओं ने बनाया माँ के पकवानों कोशायद वो नहीं भूली वो ठंडे दिनजब ग़रीबी में मसालों ने नहींबल्कि भूख और तिरस्कार में जन्मी कविताओं नेबचाया रसोई कोउनके परेशान और घबराए हुए स्पंदनहमारे कपड़ोंऔर बाकी सामानो पर लिपटकरऐसे घूरते के जैसे हमने फिर कोई नादानी का फूलउनसे बचकर बालों की बेल पर हल्के से रख दिया होवो कविताओं से रोज चूल्हा नीपतीऔर जलावन के टुकड़ों पर गीत को सजातीउनके गीत अपने हुनर के चर्म परजुदा हुए प्रेमियों को मिला...","thumbnail_url":"https://img.transistorcdn.com/CI1fAMbZA7bkv2hnc9u5BTEVfgUAS1MWnukNGfD53r4/rs:fill:0:0:1/w:400/h:400/q:60/mb:500000/aHR0cHM6Ly9pbWct/dXBsb2FkLXByb2R1/Y3Rpb24udHJhbnNp/c3Rvci5mbS9zaG93/LzQwNDQzLzE2ODA1/MzYzNTQtYXJ0d29y/ay5qcGc.webp","thumbnail_width":300,"thumbnail_height":300}