{"type":"rich","version":"1.0","provider_name":"Transistor","provider_url":"https://transistor.fm","author_name":"Pratidin Ek Kavita","title":"Rajdhani | Vishwanath Prasad Tiwari","html":"<iframe width=\"100%\" height=\"180\" frameborder=\"no\" scrolling=\"no\" seamless src=\"https://share.transistor.fm/e/f31ecd27\"></iframe>","width":"100%","height":180,"duration":169,"description":"राजधानी | विश्वनाथ प्रसाद तिवारी \n\nइतना आतंक था मन पर\nकि चौथाई तो मर चुका था\nउतरने के पहले ही\nराजधानी के प्लेटफॉर्म पर\nमेरा महानगर प्रवेश\nनववधू के गृह प्रवेश की तरह था\nमगर साथियों के साथ\nदौड़ते, लड़खड़ाते और धक्के खाते\nसीख ही लिये मैंने भी सारे काट\nलँगड़ी और धोबिया- पाट\nएक से एक क़िस्से थे वहाँ\nपरियों और विजेताओं\nआलिमों और शाइरों के\nप्याले टकराते हुए\nमैं भी बोलता था\nसिकंदर और ग़ालिब के अंदाज़ में\nहालाँकि प्याला ही भरता\nऔर दस्तरख़्वान ही बिछाता रहा\nशाही महफिलों में\nदिन बीतते रहे\nमेरी याददाश्त धुँधली होती रही\nभूलता रहा\nसाकिन मौजा तप्पा परगना\nफिर सूखने लगा पानी\nजो था आँखों में और मन में\nऔर झरने लगे भाव\nएक-एक कर पीले पत्तों की तरह\nशोर था इतना\nकि करुणा भी पहिए-सी घरघराती\nऔर शांति गुरगुराती इंजन-सी\nइतनी भागमभाग\nकि हास दिखता था\nदूर से ही उदास निराश हताश\nवीरता के लिए क्या जगह हो सकती थी\nउस चक्रव्यूह में?\nयदि प्रेम करता लड़कियों से\nतो धोखा देता किन्हें?\nइतनी रगड़ी गई चमड़ी\nभीड़ में और बेरहम मौसम में\nकि कोई अंतर नहीं रह गया\nमेरे लिए आग और पानी में\nइस तरह एक दिन\nलौटा जब राजधानी से\nतो मृतकाया में उतारा गया मैं\nअपने गाँव के छोटे-से टीसन पर।","thumbnail_url":"https://img.transistorcdn.com/CI1fAMbZA7bkv2hnc9u5BTEVfgUAS1MWnukNGfD53r4/rs:fill:0:0:1/w:400/h:400/q:60/mb:500000/aHR0cHM6Ly9pbWct/dXBsb2FkLXByb2R1/Y3Rpb24udHJhbnNp/c3Rvci5mbS9zaG93/LzQwNDQzLzE2ODA1/MzYzNTQtYXJ0d29y/ay5qcGc.webp","thumbnail_width":300,"thumbnail_height":300}