{"type":"rich","version":"1.0","provider_name":"Transistor","provider_url":"https://transistor.fm","author_name":"Pratidin Ek Kavita","title":"Hawa Mein Pul | Madan Kashyap","html":"<iframe width=\"100%\" height=\"180\" frameborder=\"no\" scrolling=\"no\" seamless src=\"https://share.transistor.fm/e/f629e802\"></iframe>","width":"100%","height":180,"duration":290,"description":"हवा में पुल | मदन कश्यपहवा में पुल थाइसीलिए हवा का पुल था क्योंकि हवा का पुल ही हवा में हो सकता था (आप चाहें तो इस पाठ को बदल सकते हैं, वह इस प्रकार:हवा का पुल था इसीलिए हवा में पुल थाक्योंकि हवा का पुलहवा में ही हो सकता था)....वैसे पुल के होने के लिए कहीं न कहीं धरती से उसका जुड़ा हुआ होना ज़रूरी होता है।पुल क्या कोई भी ढाँचाकेवल हवा में नहीं होता हवा भी हवा में नहीं होती वह भी पृथ्वी के होने पर टिकी होती है अपनी जगह पर इस सच के होने के बावजूदयह सच थाकि हवा का पुल हवा में थालोग हवा की सड़क से हवा के पुल पर आते थे और उसे पार कर हवा की किसी दूसरी सड़क से किसी तीसरी तरफ़ चले जाते थे जब वे उसी पुल से वापस लौटते थे तब हवा का वही पुल नहीं होता था हर बार नयी हवा नया पुल बनाती थीहवा के पुल पर चलते हुए लोगों को अक्सर यह पता नहीं होता था कि वे हवा के पुल पर चल रहे हैं उनके पैरों के नीचे कोई नदी भी तो नहीं दिखती थी हवा की एक नदी वहाँ होती थी मगर, वह हवा के पुल से इस तरह जुड़ी होती थी कि अलग से उसे पहचानना असम्भव होता थाइस तरह हवा में सब कुछ हवाई था उसके हवाई होने के भी कुछ अपने नियम थे इस हद तक बेकायदा थाकि बेकायदा नहीं था हवा में पुलसारी चीज़ों की पहचान यही थीकि वे अपनी-अपनी पहचान खो चुकी थीं आदमी के लिए यह तय करना कठिन हो रहा थाकि पहचान खोकर सब कुछ पा लेने और सब कुछ गँवाकर पहचान बचा लेने मेंसही क्या है जो पहचान बचा रहे थेवे चीज़ो के लिए ललचा रहे थे और जो चीज़ें हथिया रहे थे वे पहचान खोने पर पछता रहे थेएक आपाधापी थी चारों ओरकुछ लोग हवा का पुल पार कर हवा में जा रहे थे कुछ लोग हवा के पुल से लौटकरहवा में आ रहे थेहम ने भी कई-कई बारहवा का पुल पार कियाहवा में कविता लिखीहवा में क्रान्ति कीहवा को तरह-तरह से हवा देने की कोशिश कीहवा के पुल पर हमारे कदमों के निशानइतने स्पष्ट और घने बनते थेकि एक पल को ऐसा लगताहवा का पुल कहीं पदचिह्नों का पुल न बन जाए पर दूसरे ही पल इस तरह नहीं होते थे वे निशान जैसे कभी थे ही नहींहवा में पुलहवा होने के बाद भी हवा हो जाने वाला नहीं थाउसका न था कुछ ऐसा थाकि कई-कई हवाओं के गुज़र जाने के बावजूदहवा में टिका हुआ था हवा का पुल !","thumbnail_url":"https://img.transistorcdn.com/CI1fAMbZA7bkv2hnc9u5BTEVfgUAS1MWnukNGfD53r4/rs:fill:0:0:1/w:400/h:400/q:60/mb:500000/aHR0cHM6Ly9pbWct/dXBsb2FkLXByb2R1/Y3Rpb24udHJhbnNp/c3Rvci5mbS9zaG93/LzQwNDQzLzE2ODA1/MzYzNTQtYXJ0d29y/ay5qcGc.webp","thumbnail_width":300,"thumbnail_height":300}