{"type":"rich","version":"1.0","provider_name":"Transistor","provider_url":"https://transistor.fm","author_name":"Pratidin Ek Kavita","title":"Neend Uchat Jati Hai | Narendra Sharma","html":"<iframe width=\"100%\" height=\"180\" frameborder=\"no\" scrolling=\"no\" seamless src=\"https://share.transistor.fm/e/f64609dc\"></iframe>","width":"100%","height":180,"duration":167,"description":"नींद उचट जाती है । नरेंद्र शर्माजब-तब नींद उचट जाती हैपर क्या नींद उचट जाने सेरात किसी की कट जाती है?देख-देख दु:स्वप्न भयंकर,चौंक-चौंक उठता हूँ डरकर;पर भीतर के दु:स्वप्नों सेअधिक भयावह है तम बाहर!आती नहीं उषा, बस केवलआने की आहट आती है!देख अँधेरा नयन दूखते,दुश्चिंता में प्राण सूखते!सन्नाटा गहरा हो जाता,जब-जब श्वान श्रृगाल भूँकते!भीत भावना,भोर सुनहलीनयनों के न लाती है!मन होता है फिर सो जाऊँ,गहरी निद्रा में खो जाऊँ;जब तक रात रहे धरती पर,चेतन से फिर जड़ हो जाऊँउस करवट अकुलाहट थी, परनींद न इस करवट आती है!करवट नहीं बदलता है तम,मन उतावलेपन में अक्षम!जगते अपलक नयन बावले,थिर न पुतलियाँ, निमिष गए थम!साँस आस में अटकी, मन कोआस रात भर भटकाती है!जागृति नहीं अनिद्रा मेरी,नहीं गई भव-निशा अँधेरी!अंधकार केंद्रित धरती पर,देती रही ज्योति चकफेरी!अंतर्नयनों के आगे सेशिला न तम की हट पाती है!","thumbnail_url":"https://img.transistorcdn.com/CI1fAMbZA7bkv2hnc9u5BTEVfgUAS1MWnukNGfD53r4/rs:fill:0:0:1/w:400/h:400/q:60/mb:500000/aHR0cHM6Ly9pbWct/dXBsb2FkLXByb2R1/Y3Rpb24udHJhbnNp/c3Rvci5mbS9zaG93/LzQwNDQzLzE2ODA1/MzYzNTQtYXJ0d29y/ay5qcGc.webp","thumbnail_width":300,"thumbnail_height":300}