{"type":"rich","version":"1.0","provider_name":"Transistor","provider_url":"https://transistor.fm","author_name":"Pratidin Ek Kavita","title":"Aaj Shaam Hai Bahut Udaas | Bhagwati Charan Verma","html":"<iframe width=\"100%\" height=\"180\" frameborder=\"no\" scrolling=\"no\" seamless src=\"https://share.transistor.fm/e/f84f731b\"></iframe>","width":"100%","height":180,"duration":203,"description":"आज शाम है बहुत उदास । भगवतीचरण वर्मा\n\nआज शाम है बहुत उदास\nकेवल मैं हूँ अपने पास ।\n\nदूर कहीं पर हास-विलास\nदूर कहीं उत्सव-उल्लास\nदूर छिटक कर कहीं खो गया\nमेरा चिर-संचित विश्वास ।\n\nकुछ भूला सा और भ्रमा सा\nकेवल मैं हूँ अपने पास\nएक धुन्ध में कुछ सहमी सी\nआज शाम है बहुत उदास ।\n\nएकाकीपन का एकान्त\nकितना निष्प्रभ, कितना क्लान्त ।\n\nथकी-थकी सी मेरी साँसें\nपवन घुटन से भरा अशान्त,\nऐसा लगता अवरोधों से\nयह अस्तित्व स्वयं आक्रान्त।\n\nअंधकार में खोया-खोया\nएकाकीपन का एकान्त\nमेरे आगे जो कुछ भी वह\nकितना निष्प्रभ, कितना क्लान्त।\n\nउतर रहा तम का अम्बार\nमेरे मन में व्यथा अपार।\n\nआदि-अन्त की सीमाओं में\nकाल अवधि का यह विस्तार\nक्या कारण? क्या कार्य यहाँ पर ?\nएक प्रश्न मैं हूँ साकार।\n\nक्यों बनना? क्यों बनकर मिटना?\nमेरे मन में व्यथा अपार\nऔ समेटता निज में सब कुछ\nउतर रहा तम का अम्बार।\n\nसौ-सौ संशय, सौ-सौ त्रास,\nआज शाम है बहुत उदास।\n\nजोकि आज था तोड़ रहा वह\nबुझी-बुझी सी अन्तिम साँस\nऔर अनिश्चित कल में ही है\nमेरी आस्था, मेरी आस।\n\nजीवन रेंग रहा है लेकर\nसौ-सौ संशय, सौ-सौ त्रास,\nऔर डूबती हुई अमा में\nआज शाम है बहुत उदास।","thumbnail_url":"https://img.transistorcdn.com/CI1fAMbZA7bkv2hnc9u5BTEVfgUAS1MWnukNGfD53r4/rs:fill:0:0:1/w:400/h:400/q:60/mb:500000/aHR0cHM6Ly9pbWct/dXBsb2FkLXByb2R1/Y3Rpb24udHJhbnNp/c3Rvci5mbS9zaG93/LzQwNDQzLzE2ODA1/MzYzNTQtYXJ0d29y/ay5qcGc.webp","thumbnail_width":300,"thumbnail_height":300}