{"type":"rich","version":"1.0","provider_name":"Transistor","provider_url":"https://transistor.fm","author_name":"Pratidin Ek Kavita","title":"Deewana Dil | Nasira Sharma","html":"<iframe width=\"100%\" height=\"180\" frameborder=\"no\" scrolling=\"no\" seamless src=\"https://share.transistor.fm/e/fb20e322\"></iframe>","width":"100%","height":180,"duration":162,"description":"दीवाना दिल - नासिरा शर्मा \n\nअक्सर सोचती हूँ मैं\nजब भी मैंने चलना चाहा तुम्हें लेकर अपने संग\nनहीं समझ पाए तुम वह राहें\nतुम्हारे खेतों से उगी गेंहूँ की बालियों से\nफूटे दानों को बोना चाहती थी अपने आँगन में\nताकि बना सकूँ रिश्ता ज़मीन से ज़मीन का\nउसकी उगी कोंपलों के रस को पी सकूँ और\nमहसूस कर सकूँ तुमसे गहरे जुड़ाव को\n\nभेजने को कहा था तुमसे मैनें\nभेज दो कुछ ख़ुशबूदार पौधे  मुझे\nजिसे बोती मैं अपनी क्यारियों में\nऔर सूँघती तुम्हारे सीने की गंध को\nमाना तुम भेजते हो फूल किसी फ्लावर शाप से जो सूख जाते हैं दो-चार दिन में\nबिना गंध फैलाए चले जाते हैं कूड़ेदान में\nजिनसे नहीं बन पाता  वह मेरा रिश्ता जो\nमैं चाहती हूँ तुम से रूह की गहराइयों से\n\nजानती हूँ  मैं यह सब मिल जाता है मेरे शहर में\nगल्ले की दुकान से गेहूँ के दाने\nऑनलाइन नर्सरी से फूलों के बीज और पौधे!\nलेकिन तुम्हारा यह बताना कर देता है\nमेरे अहसास की मंज़िल से मुझे कोसों दूर\nजहाँ बसेरा लेना चाहता है मेरा यह दीवाना दिल!","thumbnail_url":"https://img.transistorcdn.com/CI1fAMbZA7bkv2hnc9u5BTEVfgUAS1MWnukNGfD53r4/rs:fill:0:0:1/w:400/h:400/q:60/mb:500000/aHR0cHM6Ly9pbWct/dXBsb2FkLXByb2R1/Y3Rpb24udHJhbnNp/c3Rvci5mbS9zaG93/LzQwNDQzLzE2ODA1/MzYzNTQtYXJ0d29y/ay5qcGc.webp","thumbnail_width":300,"thumbnail_height":300}