{"type":"rich","version":"1.0","provider_name":"Transistor","provider_url":"https://transistor.fm","author_name":"Pratidin Ek Kavita","title":"Lautna | Vishnu Khare","html":"<iframe width=\"100%\" height=\"180\" frameborder=\"no\" scrolling=\"no\" seamless src=\"https://share.transistor.fm/e/fc56f7ed\"></iframe>","width":"100%","height":180,"duration":179,"description":"लौटना - विष्णु खरेउसे जहाँ छोड़ा थाकभी-कभी वहाँ जाकर खड़ा हो जाता हूँकूडे़ के जिस अम्बार को देखवह लपक कर दौड़ गया थाअब वहाँ नहीं हैदरअसल अब कुछ भी वहाँ उस दिन जैसा नहीं हैमैंने उसे आधे दिल से पुकारा भी थाकि अगर लौट आए तो उसे वापस ले जाऊँलेकिन वह सिर्फ़ एक बार मेरी तरफ़ देख करमुझे ऐसा लगा कि जैसे हँसता हुआकूड़ा खोदने में जुटा रहाउसके बाद मैं चला आया लेकिन कई बार लौटा हूँवह जगह अब एकदम बदल चुकी हैनई इमारतों दूकानों की वजह से पहचानी नहीं जातीवह कूड़ा भी नहीं रहा वहाँवह सड़क अंदर जहाँ जाती थीउस पर भी कुछ दूर तक गया हूँ वह या उससे मिलता-जुलता कुछ भी दिखाई नहीं देताकभी कभी एकाध आदमी पूछ लेता हैकिसे देखते हैं भाई साहबनहीं यूँ ही या कोई और झूठ बोल कर चला आता हूँकई कारणों से वहाँ जाना कम होता गया हैऔर अब तो बहुत ज़्यादा बरस भी हो गएफिर भी कभी लौटता हूं सारी उम्मीदों के खिलाफ़और जहाँ वह कूड़े का ढेर था उससे कुछ दूरवह उतनी ही देरयाद करता खड़ा रहता हूँ कि कोई मददगार फिर पूछे नहींएक दिन ऐसे जाऊंगा कि कोई मुझे देख नहीं पाएगा और बिना पुकारे पता नहीं कहाँ सेवह झपटता हुआ तीर की तरह आएगापहचानता हुआ मुझे अपने साथ ले जाने के लिए","thumbnail_url":"https://img.transistorcdn.com/CI1fAMbZA7bkv2hnc9u5BTEVfgUAS1MWnukNGfD53r4/rs:fill:0:0:1/w:400/h:400/q:60/mb:500000/aHR0cHM6Ly9pbWct/dXBsb2FkLXByb2R1/Y3Rpb24udHJhbnNp/c3Rvci5mbS9zaG93/LzQwNDQzLzE2ODA1/MzYzNTQtYXJ0d29y/ay5qcGc.webp","thumbnail_width":300,"thumbnail_height":300}