{"type":"rich","version":"1.0","provider_name":"Transistor","provider_url":"https://transistor.fm","author_name":"Pratidin Ek Kavita","title":"Kathariyan | Ekta Verma","html":"<iframe width=\"100%\" height=\"180\" frameborder=\"no\" scrolling=\"no\" seamless src=\"https://share.transistor.fm/e/fcf60491\"></iframe>","width":"100%","height":180,"duration":251,"description":"कथरियाँ | एकता वर्मा \n\nकथरियाँ\nगृहस्थियों के उत्सव-गीत होती हैं।\nजेठ-वैसाख के सूखे हल्के दिनों में\nसालों से संजोये गए चीथड़ों को क़रीने से सजाकर\nऔरतें बुनती हैं उनकी रंग-बिरंगी धुन।\nवे धूप की कतरनों पर फैलती हैं\nतो उठती है, हल्दी और सरसों के तेल की पुरानी सी गंध।\nगौने में आयी उचटे रंग की साड़ियाँ\nबिछ जाती हैं महुए की ललायी कोपलों की तरह\nजड़ों की स्मृतियों पर।\nयुगों पुरानी कथरियाँ इतरा उठती हैं, नये लिबास में।\nकानों तक मोटे सूती धागे की तान उठती है।\nआलापों के सीधे-आड़े टप्पे पड़ते हैं लकीरों में।\nऔरत के हाथ थिरकते हैं।\nपृथ्वी पर उभरती हैं अक्षांश और देशांतर।\n(हतभाग्य! वे भी काल्पनिक कहलायी)\nघर की औरतें, भरी दोपहरी में\nइन्हे धूप दिखाती हैं,\nलेसती-रोपती हैं\nरफू रौगन करती हैं हर साल\nइस तरह वो अपना इतिहास बचाती हैं\nपुरुषों के वंश लिखे जाते हैं\nहरिद्वार में, पंडों के पत्तरों में\nऔरतों की पुरखिनें दर्ज होती हैं\nघर की इन्हीं पुरानी कथरियों में।\nये कथरियाँ\nमानव त्रासदियों की चश्मदीद हैं,\nइन्होंने, इतिहास को सबसे नंगे क्षणों में हाफते देखा है!\nउसके धब्बों में मर्सिया के आंसू सोखे हुए हैं\nसलवटों में प्रार्थनाओं की ख़ाली सीपियाँ दबी हैं,\nचटखती हैं रात बे-रात करवटों पर।\nइनमें टॅंके हैं प्यार के नर्म क़िस्से भी\nकिरोसिया की चद्दर में कढ़े गुलाब की तरह, यहाँ- वहाँ।\nरातों में फुसफुसाकर कही गई मुहब्बत की मीठी शायरियाँ\nलाड़ में पागे गये बोसे और मनुहारों पर\nरीझी थी कथरियाँ भी, बिदा होकर आयी नई-नवेली दुलहिनों के साथ-साथ\nकथरियाँ ही जानती हैं,\nदिन में मूँछों के नीचे दबे  रहे होंठ \nसबके सो जाने पर मुस्कुराते है,\nतब;\nचाँद उतरकर चारपाई की पाटी तक अता है।\nये कथरियाँ कुशल परिचायिकाएँ भी रही,\nऔरतों की सूजी हुई पीठों पर\nधरती रही गर्म फाहे ताउम्र।\nकथरियों ने भूगोल भी जाना\nवे बताती हैं, औरतों ने खारे समंदरों को अपनी पीठ पर सुखाया है।\nकथरी का सूखा हुआ कोना\n(जहां वे आदम को थपक-थपककर सुलाती हैं,)\nपृथ्वी का एक चौथाई थल है।\nजिसे किन्ही नाविकों ने नही\nऔरतों ने अपनी हथेलियों से टटोलकर ढूँढा है।\nकथरियों के पास पृथ्वी के अपने मानचित्र हैं।\nयदि कोई पुरातत्वविद इनका धागा उतके,\nतो मिलेगा\nउनका ससुरा, मैका, पाषाण-पुरापाषाण सब।\nजादुई क़ालीनों की तरह वे ले जाएँगी\nइतिहास के चिन्हित युगों के और पीछे!\nपूजागृह के...","thumbnail_url":"https://img.transistorcdn.com/CI1fAMbZA7bkv2hnc9u5BTEVfgUAS1MWnukNGfD53r4/rs:fill:0:0:1/w:400/h:400/q:60/mb:500000/aHR0cHM6Ly9pbWct/dXBsb2FkLXByb2R1/Y3Rpb24udHJhbnNp/c3Rvci5mbS9zaG93/LzQwNDQzLzE2ODA1/MzYzNTQtYXJ0d29y/ay5qcGc.webp","thumbnail_width":300,"thumbnail_height":300}