{"type":"rich","version":"1.0","provider_name":"Transistor","provider_url":"https://transistor.fm","author_name":"Pratidin Ek Kavita","title":"Goonga Nahi Tha Main | Jaiprakash Kardam","html":"<iframe width=\"100%\" height=\"180\" frameborder=\"no\" scrolling=\"no\" seamless src=\"https://share.transistor.fm/e/fd987a15\"></iframe>","width":"100%","height":180,"duration":142,"description":"गूंगा नहीं था मै - जयप्रकाश कर्दम \n \n गूँगा नहीं था मैं\nकि बोल नहीं सकता था\nजब मेरे स्कूल के मुझसे \nकई क्लास छोटे बेढँगे से एक जाट के लड़के ने मुझसे कहा था—\n‘अरे ओ मोरिया!\n  ज्यादै बिगड़े मत,कमीज कू पेंट में दबा कै मत चल।'\nऔर मैंने चुपचाप अपनी क़मीज़ पैंट से बाहर निकाल ली थी\nगूँगा नहीं था मैं न अक्षम, \nअपाहिज या जड़ था \nकि प्रतिवाद नहीं कर सकता था\nउस लड़के के इस अपमानजनक व्यवहार का\nलेकिन, अगर मैं बोल जाता \nजातीय अहं का सिंहासन डोल जाता \nसवर्ण छात्रों में जंगल की आग की तरह यह बात फैल जाती\n कि ‘ढेढों के दिमाग़ चढ़ गया है,\nमिसलगढ़ी का एक चमार का लड़का \nक़ाज़ीपुरा के एक जाट के छोरे सै अड़ गया है।’\nआपसी मतभेदों को भुलाकर तुरत-फुरत,\n स्कूल के सारे सवर्ण छात्र गोल बंद हो जाते, \nऔर खेल-अध्यापक से हॉकियाँ ले-लेकर \nदलित छात्रों पर हमला बोल देते \nइस हल्ले में कई दलित छात्रों के हाथ-पैर टूटते, \nकइयों के सिर फूट जाते \nऔर फिर, स्कूल-परिसर के अंदर झगड़ा करने के जुर्म में \nहम ही स्कूल से ‘रस्टीकेट’ कर दिए जाते।","thumbnail_url":"https://img.transistorcdn.com/CI1fAMbZA7bkv2hnc9u5BTEVfgUAS1MWnukNGfD53r4/rs:fill:0:0:1/w:400/h:400/q:60/mb:500000/aHR0cHM6Ly9pbWct/dXBsb2FkLXByb2R1/Y3Rpb24udHJhbnNp/c3Rvci5mbS9zaG93/LzQwNDQzLzE2ODA1/MzYzNTQtYXJ0d29y/ay5qcGc.webp","thumbnail_width":300,"thumbnail_height":300}