{"type":"rich","version":"1.0","provider_name":"Transistor","provider_url":"https://transistor.fm","author_name":"Pratidin Ek Kavita","title":"Pandrah Agast | Girija Kumar Mathur","html":"<iframe width=\"100%\" height=\"180\" frameborder=\"no\" scrolling=\"no\" seamless src=\"https://share.transistor.fm/e/fe0c21da\"></iframe>","width":"100%","height":180,"duration":166,"description":"पंद्रह अगस्त | गिरिजा कुमार माथुर \n\nआज जीत की रात\nपहरुए सावधान रहना\nखुले देश के द्वार\nअचल दीपक समान रहना\nप्रथम चरण है नए स्वर्ग का\nहै मंज़िल का छोर\nइस जन-मन्थन से उठ आई\nपहली रत्न हिलोर\nअभी शेष है पूरी होना\nजीवन मुक्ता डोर\nक्योंकि नहीं मिट पाई दुख की\nविगत साँवली कोर\nले युग की पतवार\nबने अम्बुधि महान रहना\nपहरुए, सावधान रहना!\nविषम शृंखलाएँ टूटी हैं\nखुली समस्त दिशाएँ\nआज प्रभंजन बन कर चलतीं\nयुग बन्दिनी हवाएँ\nप्रश्नचिह्न बन खड़ी हो गईं\nयह सिमटी सीमाएँ\nआज पुराने सिंहासन की\nटूट रही प्रतिमाएँ\nउठता है तूफ़ान इन्दु तुम\nदीप्तिमान रहना\nपहरुए, सावधान रहना\nऊँची हुई मशाल हमारी\nआगे कठिन डगर है\nशत्रु हट गया, लेकिन\nउसकी छायाओं का डर है\nशोषण से मृत है समाज\nकमज़ोर हमारा घर है\nकिन्तु आ रही नई ज़िन्दगी\nयह विश्वाश अमर है\nजन गंगा में ज्वार\nलहर तुम प्रवहमान रहना\nपहरुए, सावधान रहना!","thumbnail_url":"https://img.transistorcdn.com/CI1fAMbZA7bkv2hnc9u5BTEVfgUAS1MWnukNGfD53r4/rs:fill:0:0:1/w:400/h:400/q:60/mb:500000/aHR0cHM6Ly9pbWct/dXBsb2FkLXByb2R1/Y3Rpb24udHJhbnNp/c3Rvci5mbS9zaG93/LzQwNDQzLzE2ODA1/MzYzNTQtYXJ0d29y/ay5qcGc.webp","thumbnail_width":300,"thumbnail_height":300}