{"type":"rich","version":"1.0","provider_name":"Transistor","provider_url":"https://transistor.fm","author_name":"Pratidin Ek Kavita","title":"Todti Pathar | Suryakant Tripathi 'Nirala'","html":"<iframe width=\"100%\" height=\"180\" frameborder=\"no\" scrolling=\"no\" seamless src=\"https://share.transistor.fm/e/febb76fa\"></iframe>","width":"100%","height":180,"duration":147,"description":"तोड़ती पत्थर | सूर्यकांत त्रिपाठी निराला\nवह तोड़ती पत्थर; \nदेखा उसे मैंने इलाहाबाद के पथ पर-\nवह तोड़ती पत्थर। \n\nकोई न छायादार \nपेड़ वह जिसके तले बैठी हुई स्वीकार; \nश्याम तन, भर बँधा यौवन, \nनत नयन प्रिय, कर्म-रत मन, \nगुरु हथौड़ा हाथ, \nकरती बार-बार प्रहार :- \nसामने तरु-मालिका अट्टालिका, प्राकार। \n\nचढ़ रही थी धूप; \nगर्मियों के दिन \nदिवा का तमतमाता रूप; \nउठी झुलसाती हुई लू, \nरुई ज्यों जलती हुई भू, \nगर्द चिनगीं छा गईं, \nप्राय: हुई दुपहर :-\nवह तोड़ती पत्थर। \n\nदेखते देखा मुझे तो एक बार \nउस भवन की ओर देखा, छिन्नतार; \nदेखकर कोई नहीं, \nदेखा मुझे उस दृष्टि से \nजो मार खा रोई नहीं, \nसजा सहज सितार, \nसुनी मैंने वह नहीं जो थी सुनी झंकार \nएक क्षण के बाद वह काँपी सुघर, \nढुलक माथे से गिरे सीकर, \nलीन होते कर्म में फिर ज्यों कहा— \n‘मैं तोड़ती पत्थर।’ ","thumbnail_url":"https://img.transistorcdn.com/CI1fAMbZA7bkv2hnc9u5BTEVfgUAS1MWnukNGfD53r4/rs:fill:0:0:1/w:400/h:400/q:60/mb:500000/aHR0cHM6Ly9pbWct/dXBsb2FkLXByb2R1/Y3Rpb24udHJhbnNp/c3Rvci5mbS9zaG93/LzQwNDQzLzE2ODA1/MzYzNTQtYXJ0d29y/ay5qcGc.webp","thumbnail_width":300,"thumbnail_height":300}