{"type":"rich","version":"1.0","provider_name":"Transistor","provider_url":"https://transistor.fm","author_name":"Pratidin Ek Kavita","title":"Aapke Liye | Ajay Durgyey ","html":"<iframe width=\"100%\" height=\"180\" frameborder=\"no\" scrolling=\"no\" seamless src=\"https://share.transistor.fm/e/ff01a1c4\"></iframe>","width":"100%","height":180,"duration":176,"description":"आपके लिए | अजय दुर्ज्ञेय \nआप यहां से जाइये!\nआप जब मेरी कविताएँ सुनेंगे\nतो ऐसा लगेगा कि जैसे\nकोई दशरथ-मांझी पहाड़ पर\nबजा रहा हो हथौडे\nमैं जब बोलूंगा\nतो आपको लगेगा कि\nमैं आपके कपड़े उतार रहा हूँ और\nन केवल उतार रहा हूँ बल्कि\nउन्हीं कपड़ों से अपनी विजय पताका बना रहा हूँ\nमैं जब अपने हक़ की कविता पढ़ंगा\nतो आपको लगेगा कि\nछीन रहा हूँ आपकी गद्दी,\nछीन रहा हूँ आपका सिंहासन और इसी भय से\nगलने लगेगीं आपकी हथेलियाँ, हड्डियाँ...\nआप शर्म का बुत भी नहीं बन पायेंगे\nमैं जब कविता पढूँगा तो\nउसे सुनने के लिए आपको कोसेंगे आपके पुरखे\nसंभव है कि आपके बच्चे भी आपको गालियाँ दें और\nआप रह जाओ बिल्कुल अकेले - एक आत्मस्वीकृति और\nएक चुल्लू भर पानी के साथ। मैं जब कविता पढ़ँगा\nतो आपको लगेगा कि आपके चुल्लू में आया वह पानी भी,\nकिसी और के श्रम का फल है। हॉँ! वह है-\nबस आप समझने में विफल हैं।\nऔर इसी बीच- कविताओं को सींच,\nमैं जब रहूँगा मूक- तब भी आपको लगेगा कि जैसे\nभरे दरबार, उतर गया है कोई शम्बूक-\nजो चुप तो है मगर जिसकी आँखों में\nतप है, प्रतिरोध है, अवज्ञा है। और जो बस यही पूछता है\nकि वह कौन है? उसका अपराध क्या है? और मैं जब अपना अपराध पूछुँगा\nतो आपको लगेगा कि आपके हाथों में पहना रहा हूँ हथकाड़ियाँ\nऔर श्रीमान! सच तो यह है कि\nआप यहाँ से जाइये या यहीं उपवास करिये या\nनंगे बदन लेट जाइये या कुछ भी करिये - मगर अब,\nजब तक यह जाति का पहाड़ रहेगा, किसी रूप में, एक इंच भी-\nमेरा हथौड़ा नहीं रुकेगा।","thumbnail_url":"https://img.transistorcdn.com/CI1fAMbZA7bkv2hnc9u5BTEVfgUAS1MWnukNGfD53r4/rs:fill:0:0:1/w:400/h:400/q:60/mb:500000/aHR0cHM6Ly9pbWct/dXBsb2FkLXByb2R1/Y3Rpb24udHJhbnNp/c3Rvci5mbS9zaG93/LzQwNDQzLzE2ODA1/MzYzNTQtYXJ0d29y/ay5qcGc.webp","thumbnail_width":300,"thumbnail_height":300}