Pratidin Ek Kavita

दस्तख़त – सूर्यबाला
 
छमाही के नतीजे पर दस्तख़त करती-
हंसी थी मां-
‘तू फिर फर्स्ट आई है?...’
दुबली उंगलियों में कांपी है कलम- 
यज्ञ की समिधा की अग्नि सी
और पूजा की चौकी पर,
झुके माथे के नीचे-
उसकी आंखों की कोर डबडबाई है!...
हो गए दस्तख़त
 

What is Pratidin Ek Kavita?

कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।