Pratidin Ek Kavita

कैसे लोग थे हम - विश्वनाथ प्रसाद तिवारी 

गेहूँ की बालियों में लगते रहे कीड़े
हम खामोश रहे
सफेद कपड़ों से काँपते रहे गाँव
हम खामोश रहे
समुद्र में तूफान आया
हम खामोश रहे
ज्वालामुखी विस्फोट हुए
हम खामोश रहे
बादलों से आग की वर्षा हुई
हम खामोश रहे
उसने खींच ली म्यान से तलवार
हम खामोश रहे
कैसे लोग थे हम
हमें बोलने की छूट दी गई
हम खामोश रहे।

What is Pratidin Ek Kavita?

कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।