18 नम्बर बेंच पर। दूधनाथ सिंह 18 नम्बर बेंच पर कोई निशान नहीं चारों ओर घासफूस –- जंगली हरियाली कीड़े-मकोड़े मच्छर अँधेरा वर्षा से धुली हरी-चिकनी काई की लसलस चींटियों के भुरेभुरे बिल –- सन्नाटा बैठा सन्नाटा । क्षण वह धुल-पुँछ बराबर कौन यहाँ आया बदलती प्रकृति के अलावा प्रशासनिक भवन से दूर कुलसचिव के सुरक्षा-गॉर्ड की नज़रों से बाहर ऋत्विक घटक की डोलती दुबली छाया से उतर कौन यहाँ आया एकान्त की मृत्यु बस रोज़ रात -– व्यर्थ वृक्षों की छिदरी छाँह, झूमती हवा की चीत्कार संग मैं फिरता वहाँ सब कुछ गुज़रता है चुपचाप आज रात नहीं कोई वहाँ बात नहीं कोई झँपती आँख नहीं कोई ।