कलम। विश्वनाथ प्रसाद तिवारी कलम उठाओ इसे इसमें छिपा है देवताओं-अप्सराओं का गान अबोध शिशुओं की मुस्कान यह भर सकती है फूलों में रंग पानी में आग और आग में थोड़ी-सी रोशनी फेंको इसे तौलकर शिलाखंड से फूट पड़ेंगे निर्झर बह जाएँगे ब्रह्मास्त्र यह दे सकती है अनाम को नाम अरूप को रूप सन्नाटे को शब्द मिटा सकती है जंगल और समुद्र की लिपि बना सकती है धरती का व्याकरण अगर तुम्हारी गफलत से यह पड़ी रह गई अँधेरे में तो धरती पर छा जाएगा अंधकार दहाड़ने लगेंगे हिंस्त्र पशु उठाओ इसे सिसक रही है यह अँधेरे में असहाय इसे चाहिए एक हाथ जिसने वेद लिखा और लोहा गलाया इसे चाहिए एक हाथ जो कभी मत लिखे उपसंहार उपसंहार के लिए छोड़ जाए इसे।