Pratidin Ek Kavita

अंतिम आलाप | प्राची

कितना और समेटूँ ख़ुद को!

ख़ुद की सूनी-वंचित बाँहों में
धूप का छुआ मेरा रंग

कपड़ों के इस पार तक ही है
तुम्हारे छूने की लालसा

अंतस को कचोटती
अँधेरे में सकुचाती

और सर्वस्व त्याग देने को खड़ी—
ध्यान-मुद्रा में

पेड़ो-पहाड़ो-जानवरो-बच्चो,
कोई तो मेरी देह अपने तक खींच लो,

ख़ुद के भार से मैं धँसती जा रही हूँ
अंतिम आलाप का आख़िरी सुर

जहाँ न पहुँचे
वहीं कहीं छुपी बैठी हूँ।

What is Pratidin Ek Kavita?

कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।