Pratidin Ek Kavita

परचून | अनामिका

पंसारी जहाँ भी लगा दे दस बोरियाँ–
पटरी पर, गैराज में, खोली के अन्दर– 
रख ले दो-चार बोइयाम– 
आराम से वहीं सज जाती है 
खुदरा परचून की दुकान– 
बड़े-बड़े स्टोरों से सीधी आँखें लड़ाती! 
बकझक, कुछ मोलतोल, हालचाल या आपसदारी, 
‘आज नकद, कल उधार’ की पट्टी के बावजूद 
कई महीनों की बेरोक वह देनदारी–
इनके बिना बड़ी बेस्वाद है खरीदारी– 
नहीं जानती यह एफ.डी.आई.!

What is Pratidin Ek Kavita?

कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।