Pratidin Ek Kavita

चोरी | गीत चतुर्वेदी 

प्रेम इस तरह किया जाए 
कि प्रेम शब्द का कभी ज़िक्र तक न हो 
चूमा इस तरह जाए 
कि होंठ हमेशा ग़फ़लत में रहें 
तुमने चूमा 
या मेरे ही निचले होंठ ने औचक ऊपरी को छू लिया 
छुआ इस तरह जाए 
कि मीलों दूर तुम्हारी त्वचा पर 
हरे-हरे सपने उग आएँ 
तुम्हारी देह के छज्जे के नीचे 
मुँहअँधेरे जलतरंग बजाएँ 
रहा इस तरह जाए 
कि नींद के भीतर एक मुस्कान 
तुम्हारे चेहरे पर रहे 
जब तुम आँख खोलो, वह भेस बदल ले 
प्रेम इस तरह किया जाए 
कि दुनिया का कारोबार चलता रहे 
किसी को ख़बर तक न हो कि प्रेम हो गया 
ख़ुद तुम्हें भी पता न चले 
किसी को सुनाना अपने प्रेम की कहानी 
तो कोई यक़ीन तक न करे 
बचना प्रेमकथाओं का किरदार बनने से 
वरना सब तुम्हारे प्रेम पर तरस खाएँगे

What is Pratidin Ek Kavita?

कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।