Pratidin Ek Kavita

चाँदनी की पाँच परतें / सर्वेश्वर दयाल सक्सेना

चाँदनी की पाँच परतें,
 हर परत अज्ञात है।
 
 एक जल में
 एक थल में,
 एक नीलाकाश में।
 एक आँखों में तुम्हारे झिलमिलाती,
 एक मेरे बन रहे विश्वास में।
 
 क्या कहूँ, कैसे कहूँ…..
 कितनी ज़रा सी बात है।
 चाँदनी की पाँच परतें,
 हर परत अज्ञात है।
 
 एक जो मैं आज हूँ,
 एक जो मैं हो न पाया,
 एक जो मैं हो न पाऊँगा कभी भी,
 एक जो होने नहीं दोगी मुझे तुम,
 एक जिसकी है हमारे बीच यह अभिशप्त छाया।
 
 क्यों सहूँ, कब तक सहूँ….
 कितना कठिन आघात है।
 चाँदनी की पाँच परतें,
 हर परत अज्ञात है।

What is Pratidin Ek Kavita?

कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।