Pratidin Ek Kavita

कैसा संत हमारा | साग़र निज़ामी

कैसा संत हमारा
गांधी
कैसा संत हमारा

दुनिया गो थी दुश्मन उसकी दुश्मन था जग सारा 
आख़िर में जब देखा साधो वह जीता जग हारा 

कैसा संत हमारा
गांधी
कैसा संत हमारा!

सच्चाई के नूर से उस के मन में था उजियारा 
बातिन में शक्ती ही शक्ती ज़ाहर में बेचारा 

कैसा संत हमारा
गांधी
कैसा संत हमारा!

बूढ़ा था या नए जनम में बंसी का मतवारा 
मोहन नाम सही था पर साधो रूप वही था सारा 

कैसा संत हमारा
गांधी
कैसा संत हमारा!

भारत के आकाश पे वो है एक चमकता तारा 
सचमुच ज्ञानी, सचमुच मोहन सचमुच प्यारा-प्यारा 

कैसा संत हमारा
गांधी
कैसा संत हमारा!

What is Pratidin Ek Kavita?

कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।