Pratidin Ek Kavita

दर्शन | अजंता देव

मुझे कभी नहीं दीखता
अपना असली चेहरा
वह चेहरा
जो दूसरे देखते हैं।
मुझे हर बार सहारा लेना पड़ता है
आईने का
और जब आईने के सामने होती हूँ
तब मेरा चेहरा होता है
तनावरहित
ख़ुशमिज़ाज
प्रसाधनों से दमकता
मुझे कभी पता नहीं चलेगा
ग़ुस्से और नफ़रत से जलती आँखों का
नींद में ढलके होठों का
खाते समय फूलते-पिचकते गालों का
प्रियजनों के बीच छलकते अनुराग का
बहुत पहले
मेरे जन्म पर
लोगों ने देखा था मेरा चेहरा पहली बार
ऐसे ही किसी दिन
रुख़्सती होगी पृथ्वी से 
तब भी
शोकगीतों के बीच
लोग ही करेंगे मेरा अंतिम दर्शन

What is Pratidin Ek Kavita?

कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।