विस्मृति का फूल । गोबिंद प्रसाद ...मैं हूँ मैं हूँ किसी का ...हूँ किसी का सपना देखा हुआ अनदेखा अपना स्मृति में जैसे बसा-किसी की विस्मृति का फूल बन, खिलने की हसरत में दिन-रात तपना पहरों-पहरों, देह की देहरी पर रह-रहकर अंगार-सा दहकना