दिन बौने हो गए | उमाकांत मालवीय रातें लम्बी हुईं दिन बौने हो गए । ठिगने कद वाले दिन लम्बी परछाइयाँ धूप की इकाई पर तिमिर की दहाइयाँ रातें पत्तल हुईं दिन दौने हो गए । कुहरों पर लिखी गई विष भरी कहानियाँ नीली पड़ने लगी सुबह की जवानियाँ रातें आँगन हुईं दिन कौने हो गए । बर्फ़ीले ओठों पर शब्द ठिठुरने लगे नाकाफ़ी ओढ़ने बिछौने जुड़ने लगे रातें अजगर हुईं दिन छौने हो गए ।