Pratidin Ek Kavita

 मंगल गान - अशोक वाजपेयी

नदी गा रही है
नदी से नहा कर लौटता देव-शिशु गा रहा है 
किनारे के किसी झुरमुट में अदृश्य एक चिड़िया गा रही है
नदी तक जाती पगडंडी अपनी हरी घास में धीरे से गा रही है
नदी पर झलकता रक्तिम सूर्यास्त गा रहा है
फ़ीकी सी आभा लिए उभरता अर्धचंद्र गा रहा है
गा रहे हैं सभी एक असमाप्य मंगलकामना

मुझे सुनाई नहीं देता पृथ्वी का आकाश का मंगल गान?
सुनता हूँ विलाप,चीख पुकार, चीत्कार 
सुनाई नहीं देता कोई मंगल गान!
लगता है सुनाई दे रहा है ईश्वर का सिसकना, आकाश का कोने में जाकर बिलखना,
पृथ्वी का अपने निबिड़ एकांत में चीखना।
सुनाई नहीं देता कोई मंगल गान। 

What is Pratidin Ek Kavita?

कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।