नफ़ी | किश्वर नाहीद मैं थी आईना फ़रोश* (विक्रेता) कोह-ए-उम्मीद* (आशा का पहाड़) के दामन में अकेली थी ज़ियाँ* (नुक़्सान) कोशिश सुरय्या की थी हम-दोश मुझे हर रोज़ हमा-वक़्त* (हर समय) थी बस अपनी ख़बर मैं थी ख़ुद अपने में मदहोश मैं वो तन्हा थी जिसे पैर मिलाने का सलीक़ा भी न था मैं वो ख़ुद-बीं* (आत्म-मुग्ध) थी जिसे अपने हर इक रुख़ से मोहब्बत थी बहुत मैं वो ख़ुद-सर* (अवज्ञाकारी) थी जिसे हाँ के उजालों से बहुत नफ़रत थी मैं ने फिर क़त्ल किया ख़ुद को पिया अपना लहू हँसती रही लोग कहते हैं हँसी ऐसी सुनी तक भी नहीं