Pratidin Ek Kavita

परवाह | जसिंता केरकेट्टा

माँ  
एक बोझा लकड़ी के लिए 
क्यों दिन भर जंगल छानती, 
पहाड़ लाँघती, 
देर शाम घर लौटती हो? 
माँ कहती है : 
जंगल छानती, 
पहाड़ लाँघती, 
दिन भर भटकती हूँ 
सिर्फ़ सूखी लकड़ियों के लिए। 
कहीं काट न दूँ कोई ज़िंदा पेड़! 

What is Pratidin Ek Kavita?

कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।