पॉलिटिकल एंड फिज़ीकल मैप्स ऑफ इंडिया। प्रियंक्षी मोहन अखबार के पीछे से भेदती हैं पिता की आँखें एक समय के बाद माँ के हाथ की बनी गर्म, फूली हुई रोटियां भी फफोले सी नज़र आती है नकारेपन में इतना घूम लिया है शहर कि प्रेम करने के लिए तो मिल जाता है एक कोना मिल ही जाता है पर, "क्या करते हो बेटा?" जैसे सवालों से छुपने के लिए दूर दूर तक कोई जगह नज़र नहीं आती है "दरवाज़े बाई तरफ खुलेंगे" हर रोज़ सुन सुनकर भी पता नहीं चलता कि आखिर जाना किस तरफ है राशन की दुकान में जैसे ताखों से झांकते हैं चूहे उसी तरह बाप के दिलाए हुए महंगे कपड़ों की खाली जेबों से बटुए झांकते है भाइयों पर ज़िम्मा है बहनों को ब्याहने का और बहनों को होने वाले पतियों की बहनों का दहेज़ बनवाने का हम उलझे थे सदा और उलझे ही रहेंगे ऊन के गोलों की तरह हम देश बदलने का जज़्बा रखने वाले युवा एक दिन दिखते ही देखते पॉलिटिकल और फिज़ीकल मैप्स ऑफ इंडिया में बदल ही जाते हैं