आवारा दिन। पूर्णिमा वर्मन दिन कितने आवारा थे गली गली और बस्ती बस्ती अपने मन इकतारा थे माटी की खुशबू में पलते एक खुशी से हर दुख छलते बाड़ी, चौक, गली अमराई हर पत्थर गुरुद्वारा थे हम सूरज भिनसारा थे किसने बड़े ख़्वाब देखे थे किसने ताज महल रेखे थे माँ की गोद, पिता का साया घर घाटी चौबारा थे हम घर का उजियारा थे