विश्वास । आभा बोधिसत्व मैंने अपने सिर पर जो विश्वास की दीवार खड़ी की वहाँ यही लिखा बार-बार दुख बहुत छोटा है ख़ुशी बहुत बड़ी छोटे और बड़े के फ़र्क़ को जीना ही सागर बन जाना है एक दिन बूँद-बूँद जुड़ कर विश्व