हर बार दीवार। ज्योत्स्ना मिलन आसमान होगा की उम्मीद में बाहर देखती खिड़की से बाहर दीवार होती सामने और होती फाँक भर धूप दो दीवारों के बीच धरी-सी दीवार की जगह आसमान नहीं निकला कभी घास का मैदान भी नहीं खिड़की के बाहर हर बार एक दीवार आसमान के बदले।