Pratidin Ek Kavita

एक बिजूके की प्रेम कहानी | अनामिका 

मैं हूँ बिजूका 
एक ऐसे खेत का
जिसमें सालों से कुछ नहीं उगा
बेकार पड़ा पड़ा धसक गया है मेरा 
हाड़ी सा गोल गोल माथा, उखड़ गई हैं मूँछें लचक गए हैं कंधे
एक तरफ़ झूल गया है कुर्ता 
कुर्ते की जेबी में चुटुर- पुटुर करती है लेकिन 
नीले पीले पंखों वाली इक छोटी-सी चिड़िया
एक वक़्त था जब यह चिड़िया मुझ से बहुत डरती थी

धीरे-धीरे उसका डर निकल गया
कल मेरी जेबी में अंडे दिए उसने 
मेरे भरोसे ही उन्हें छोड़ कर जाती है वह दाना लाने
बहुत दूर
नया नया है मेरी ख़ातिर भरोसे का कोमल एहसास
काठ के कलेजे में मेरे बजने लगा है इकतारा
दूर तलक है उजाड़ मगर यह जो चटकने चमकने लगी है बूटी भरोसे की

उसकी ही मूक प्रार्थना फूली है शायद कि बदलियाँ उमड़ आई हैं अचानक
खिल जाएंगी बूटियाँ अब तो
बस जाएगा फिर से यह उजड़ा दयार
लेकिन जब खेत हरे हो जाएँगे
मुझको फिर से भयावह बना देंगे खेतों के मालिक
हाड़ी मुख पर मेरे कोलतार पोतेंगे
लाल नेल पॉलिश से आँखें बनाएँगी ख़ून टपकती हुई, मक्के के मूंछों पर लस्सा लगाकर मुझे बनाएंगे ख़ूब कड़क 
ढह जाएगी तब तो मेरी निरीहता 
जब मैं भयावह हो जाऊंगा फिर से 
डर जाएगी मेरी चिड़िया मुझी से 
और दूर उड़ जाएगी सदा के लिए 
क्या बेबसी प्यार का घर है
प्यार हमदर्द नगर है?


What is Pratidin Ek Kavita?

कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।