Pratidin Ek Kavita

माँ का करघा | डॉ सूर्यबाला 

हीरे की कनियों से, मोती की लड़ियों से,
चाँदी के तारों, बूटे, लाड़ दुलारों के,
ख़ुशबू के धागों से, आँसू की धारों से
इतने सपने, और सब सपने,
इतने-इतने सारे सपने
मेरी अम्माँ ने बुने
झलमली आखों के हथकरघे पे

What is Pratidin Ek Kavita?

कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।